Siddaramaiah MUDA Scam Case: कर्नाटक में एक बड़ा सियासी भूचाल आया है क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भ्रष्टाचार का केस चलाने की मंजूरी दे दी है। सीएम सिद्धारमैया के खिलाफ MUDA स्कैम के आरोप हैं। दूसरी ओर विपक्ष में बैठी बीजेपी इस मामले में उनका इस्तीफा मांग रही हैं। कांग्रेस पार्टी फिलहाल तो उनके साथ खड़े होने की बात कर रही है लेकिन यह मसला अगर ऐसे ही चर्चा में रहा, तो परसेप्शन की जंग में सिद्धारमैया के लिए सियासी तौर पर मुश्किलें बढ़ सकती हैं। आखिर ये पूरा मामला क्या है और सत्ता पक्ष-विपक्ष के बीच किस बात को लेकर टकराव है, चलिए इसे समझते हैं।

दरअसल, शनिवार को कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया भ्रष्टाचार के आरोप में घिरते नजर आ रहे हैं, क्योंकि राज्यपाल द्वारा केस चलाने की मंजूरी मिलने के बाद, बीजेपी भी उन पर हमलावर है। यह मामला 3.14 एकड़ जमीन से संबंधित है, जो कि उनकी पत्नी पार्वती के नाम है और यह 3.14 एकड़ की जमीन के चलते बीजेपी मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांग रही है।

क्या है MUDA Scam Case?

MUDA केस की बात करें तो यह मामला मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण का है, जिसे MUDA कहते हैं, जो कि एक ऑटोनामस बॉडी मानी जाती है। इसके अलावा इसी प्राधिकरण की ही जिम्मेदारी जमीनों के आवंटन की भी है। इस पूरे मामले की शुरुआत 2004 से होती है, उस समय मुआवजे के तौर पर जमीन के पार्सल के आवंटन से जुड़ा है और उस दौरान भी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ही थे। इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई हैं। इससे सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान हुआ है। इस कथित भ्रष्टाचार के मामले में MUDA के भी कई अधिकारियों के नाम सामने आए हैं।

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क्या है सिद्धारमैया और उनकी पत्नी पर आरोप?

इस मामले में मुख्यमंत्री सिद्धारमयैा की पत्नी पर आरोप है कि 3.16 एकड़ जमीन MUDA द्वारा अधिग्रहित की गई, लेकिन इसके बदले में एक महंगे इलाके में 14 साइटें आवंटित की गईं। मैसूर के बाहरी इलाके केसारे में यह जमीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी पार्वती को उनके भाई मल्लिकार्जुन स्वामी ने 2010 में उपहार स्वरूप दी थी। आरोप है कि मुडा ने इस जमीन का अधिग्रहण किए बिना ही देवनूर तृतीय चरण की योजना विकसित कर दी, इसका लाभ सिद्धारमैया की फैमिली को मिला था।

इसकी वजह यह है कि अधिग्रहण के मुआवजे के लिए मुख्यमंत्री की पार्वती ने आवेदन किया जिसके आधार पर, मुडा ने विजयनगर III और IV फेज में 14 साइटें आवंटित कीं थी। यह आवंटन राज्य सरकार की 50:50 अनुपात योजना के तहत कुल 38,284 वर्ग फीट का था जिन 14 साइटों का आवंटन मुख्यमंत्री की पत्नी के नाम पर हुआ उसी में घोटाले के आरोप लग रहे है। विपक्ष मुखर होकर कह रहा है कि पार्वती को MUDA द्वारा इन साइटों के आवंटन में अनियमितता बरती गई है।

पिछले साल हुआ था इस कथित भ्रष्टाचार का खुलासा

अब सवाल यह है कि इस कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा सामने कब आया, तो बता दें कि यह बीते महीने जुलाई की शुरुआत में सामने आया, 1 जुलाई को आईएएस अधिकारी वेंकटचलपति आर के नेतृत्व में जांच के लिए एक सरकारी आदेश जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि MUDA की जमीन आवंटन में अनियमितताओं को लेकर शक है, यह जमीनें लाभार्थियों को देने के विपरीत प्रभावशाली लोगों को दे दी गई। राज्य में कथित घोटाले के मामले सामने आने के बाद, कर्नाटक के नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने सीधा आरोप सिद्धारमैया पर ही लगाया और कहा कि उन्हें भी नियमों का उल्लंघन करते हुए एक वैकल्पिक साइट दी गई थी।

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डीके शिवकुमार बोले – हम सिद्धारमैया के साथ

इस मामले में सिद्धारमैया के साथी और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा कि कर्नाटक के राज्यपाल ने मुक़दमा चलाने की परमिशन दी है। प्रारंभिक जांच और रिपोर्ट के बाद ऐसी परमिशन दी जाती हैय़ इसके लिए डीके शिवकुमार ने एचडी कुमारास्वामी के मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि लोकायुक्त की रिपोर्ट के आधार पर मुकदमा चलाने की अपील की गई थी। उन्होंने कहा कि पूरा मंत्रिमंडल सीएम सिद्धारमैया के साथ खड़ा है। वही हमारे सीएम हैं और रहेंगे।

विपक्ष ने सिद्धारमैया पर लगाया पद का फायदा उठाने का आरोप

विपक्षी दलों की बात करें तो बीजेपी और जेडीएस का आरोप है कि साल 1998 से लेकर 2023 तक सिद्धारमैया राज्य के प्रभावशाली और अहम पदों पर रहे थे। उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया, वे सीधे तौर पर शामिल नहीं रहे लेकिन उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल न किया हो ऐसा नहीं हो सकता। इस मामले में केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता शोभा करनलाजे का बयान आया कि हम तो पहले ही कह चुके हैं कि जमीन के लेनदेन का मामला (MUDA Case) जब से शुरू हुआ तभी से सिद्धारमैया हमेशा अहम पदों पर रहे, इस मामले में उनके परिवार पर लाभार्थी होने का आरोप है। ऐसे में उनकी इसमें भूमिका ना हो ऐसा हो ही नही सकता।

वहीं इस मामले में सीएम सिद्धरमैया ने कहा कि उनकी इस केस में कोई भूमिका ही नहीं है। अगर उनकी नियत में खोट होता तो 2013 से 2018 के बीच मुख्यमंत्री रहते हुए वो अपनी पत्नी की फाइल पर कार्रवाई कर सकते थे। अगर कुछ गलत था और नियमों की अनदेखी हुईं थी तो बीजेपी की बसवराज बोम्मई सरकार ने उनकी पत्नी को प्लॉट्स क्यों दिए? सिद्धारमैया पहले ही कह चुके हैं कि वह इस मामले पर कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं। माना जा रहा है कि इस केस को लेकर सिद्धारमैया हाई कोर्ट का रुख कर सकती है।