दामिनी नाथ
Rajasthan: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Vice President Jagdeep Dhankhar) साल 1973 में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के एक फैसले को लेकर अदालतों पर जमकर बरसे। उपराष्ट्रपति ने कहा, साल 1973 में ये गलत परंपरा लागू हुई थी केशवानंद भारती केस (Keshvanand Bharti Case) में सुप्रीम कोर्ट ने बेसिक स्ट्रक्चर (Basic Structure) का आइडिया (Idea) देते हुए कहा था कि संसद (Parliament) चाहे तो संविधान (Constitution) का संशोधन कर सकती है, लेकिन इसके बुनियादी ढांचे का नहीं। जगदीप धनखड़ ने कहा कि साल 2015 में ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी कानून पारित किया गया था, जो सर्वसममति से पारित हुआ। 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं हुआ है सुप्रीम कोर्ट के फैसले के सामने ससंद की संप्रभुता से समझौता कैसे हो सकता है?
83वें पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में बोले Jagdeep Dhankhar
इस दौरान उपराष्ट्रपति ने संसद के बनाए कानून को सुप्रीम कोर्ट से रद्द करने पर जमकर नाराजगी जताई। इस दौरान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि ससंद ने जो कानून बनाया है क्या उस पर कोर्ट की मुहर लगेगी, तभी वो कानून माना जाएगा? जयपुर में 83वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में धनखड़ ने कहा कि मैं कोर्ट को सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि इससे मैं सहमत नहीं, हाउस बदलाव कर सकता है। यह सदन बताए कि क्या इसे किया जा सकता है? धनखड़ ने एक बार फिर न्यायपालिका और विधायिका में तुलना करते हुए दोनों की शक्तियों का मुद्दा उठाया।
11 जनवरी से जयपुर में जारी है AIPOC
उपराष्ट्रपति ने आगे कहा कि संसदीय संप्रभुता और स्वायत्तता को समझौता करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए सर्वोच्च है। उन्होंने आगे कहा कि विधायिका के पास न्यायिक आदेश लिखने की शक्ति नहीं है, कार्यपालिका और न्यायपालिका के पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है। आपको बता दें कि कि राजस्थान विधानसभा में 11 जनवरी से दो दिन तक अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन हो रहा है, जिसमें देश भर के विधानसभा और विधान परिषद स्पीकर्स हिस्सा ले रहे हैं।
OM Birla ने बताया एक-दूसरे के सम्मान करने का महत्व
इसके पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के एक दूसरे का सम्मान करने के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि विधायिकाओं ने हमेशा न्यायपालिका की शक्तियों और अधिकारों का सम्मान किया है और न्यायपालिका से संविधान द्वारा अनिवार्य शक्तियों को बांट कर रखने की अपेक्षा की गई थी। उन्होंने कहा कि तीनों शाखाओं को आपसी विश्वास और सद्भाव के साथ काम करना चाहिए।
