भारतीय उच्च शिक्षा आयोग के गठन के लिए सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक ला रही है। इसमें विश्वविद्यालय अनुदान (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) व राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को समाप्त करने का प्रस्ताव भी हो सकता है। संसद के शीतकालीन सत्र में आयोग विधेयक, 2025 को सूचीबद्ध किया गया है।
विश्वविद्यालयों के शिक्षकों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। उनका आरोप है कि सरकार इस आयोग के जरिए उच्च शिक्षा व सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का निजीकरण करना चाहती है। सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा, अनुसंधान तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों में समन्वय स्थापित करने और मानक निर्धारित करने के लिए इस आयोग की स्थापना की जानी है।
दिग्विजय सिंह की संसदीय समिति ने जताया था विरोध
एक ही राष्ट्रीय निकाय होने से फैसले तेज होंगे और संस्थागत संरचना अधिक पारदर्शी तथा प्रभावी बनेगी। वहीं, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी आयोग का प्रावधान किया है। इसके अनुरूप ही यूजीसीए, आइसीटीई और एनसीटीई की जगह एक ही आयोग चलाने का प्रस्ताव है। वहीं, कानून और चिकित्सा शिक्षा इस आयोग के दायरे से बाहर रह सकते हैं। हालांकि, राज्यसभा के कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति इस तरह के आयोग के गठन पर आपत्ति जता चुकी है। समिति का दावा है कि यूजीसी जैसी संस्थाओं को समाप्त कर देना शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन पैदा करने के साथ निजीकरण को बढ़ावा दे सकता है।
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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के शिक्षक सुरजीत मजूमदार ने कहा कि भारतीय उच्च शिक्षा आयोग के माध्यम से केंद्र सरकार उच्च शिक्षा के साथ सरकारी विश्वविद्यालयों का निजीकरण करना चाहती है। इस आयोग के माध्यम से नियामक और वित्त पोषण के कार्य को सरकार अलग-अलग करने के बारे में सोच रही है। सरकार ऐसा ढांचा बनाना चाहती है, जहां उच्च शिक्षा पर उसका नियंत्रण तो हो लेकिन आर्थिक जिम्मेदारी न हो।
इस आयोग के बनने के बाद विश्वविद्यालय कारपोरेट माडल पर चलेंगे। अभी शिक्षक, जो विश्वविद्यालयों की संपत्ति हैं और विद्यार्थी, जिनके लिए विश्वविद्यालय होते हैं, दोनों अपने मुद्दों को सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंचा पाते हैं लेकिन इस आयोग के बाद ऐसा नहीं हो पाएगा।मजूमदार ने कहा कि इससे शिक्षकों के सेवा नियम बदलेंगे जिससे शिक्षकों की स्वायत्तता खत्म होने की आशंका है। अभी भी पदोन्नति आदि के कारण शिक्षकों पर काफी दबाव रहता है, इस आयोग से इस समस्या में इजाफा होगा।
विरोध कर रहे शिक्षक
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की कार्यकारी परिषद के पूर्व सदस्य राजेश झा ने कहा कि भारतीय उच्च शिक्षा आयोग का हम जोरदार विरोध करते हैं क्योंकि यह सरकार द्वारा महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के निजीकरण के लिए उठाए जाने वाला कदम है। किसी भी क्षेत्र में नियामक संस्था को लाने का मतलब ही है कि उसे निजी क्षेत्र में ले जाया जा रहा है। दूसरी बात ये आयोग विश्वविद्यालयों को अनुदान नहीं देगा।
विश्वविद्यालयों को कर्ज और विद्यार्थियों की फीस पर निर्भर कर दिया जाएगा। इससे गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए जो उच्च शिक्षा और अधिक महंगी हो जाएगी जो कि सामाजिक न्याय और समानता पर एक गहरा आघात है।
