सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी लड़की को ‘कॉल गर्ल’ कहना उसे आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जाएगा। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई महिला उसे कॉल गर्ल कहे जाने पर आत्महत्या करती है तो यह आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं हो सकता। बता दें कि आत्महत्या को उकसाने के लिए 10 साल तक की जेल हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस आर.सुभाष रेड्डी की बेंच ने बंगाल सरकार की अपील को खारिज करते हुए यह फैसला दिया।
क्या है मामलाः बता दें कि मामला पश्चिम बंगाल का है, जहां एक कोचिंग में पढ़ने वाली युवती को अपने टीचर से प्यार हो गया था। इसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया और लड़की 5 मार्च, 2004 को लड़के के परिजनों से मिलने और शादी की बात करने पहुंची।
बताया जा रहा है कि लड़के के माता-पिता लड़की पर भड़क गए और उन्होंने उसे गुस्से में ‘कॉल गर्ल’ कह दिया और अपने लड़के की उसके साथ शादी कराने से इंकार कर दिया। इसके बाद लड़की अपने घर लौटी और अगले दिन उसने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले लड़की ने दो सुसाइड नोट भी छोड़े, जिसमें उसने लड़के और उसके माता-पिता को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया।
पीड़िता के पिता की शिकायत पर पुलिस ने इस मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज कर लिया। मामले में लड़के और उसके माता-पिता को आरोपी बनाया गया। लड़के के पिता की मौत हो चुकी है, इसलिए केस से उनका नाम हटा दिया गया है।
निचली अदालत ने किया दोषमुक्तः बता दें कि कलकत्ता की एक निचली अदालत ने साल 2008 में आरोपी लड़के और उसकी मां को दोषमुक्त करार दे दिया था। इसी साल 30 जुलाई को कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया।
अदालत के इसी फैसले को चुनौती देते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। लेकिन अब वहां से भी आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया गया है। मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में ‘स्वामी प्रह्लाददास वर्सेस स्टेट ऑफ एमपी (1995)’ केस का भी जिक्र किया। जिसमें पति द्वारा अपनी पत्नी को ‘कहीं जाकर मरने’ की बात कही गई थी। जिसके बाद पत्नी की आत्महत्या के आरोप में अदालत ने पति को यह कहकर रिहा कर दिया था कि किसी को ‘कहीं जाकर मरने’ के लिए कहना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है।

