गुरुवार को जस्टिस रविंद्र भट्ट ने भी खुद को सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा की याचिका पर सुनवाई से अलग कर लिया। गौतम नवलखा ने सुप्रीम कोर्ट में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इंकार कर दिया था। बता दें कि गौतम नवलखा की याचिका पर सुनवाई से इंकार करने वाले जस्टिस रविंद्र भट्ट सुप्रीम कोर्ट के पांचवें जज हैं। उनसे पहले बीते तीन दिनों में जस्टिस एनवी रामाना, जस्टिस आर.सुभाष रेड्डी, जस्टिस बी.आर.गवई और चीफ जस्टिस रंजन गोगोई भी गौतम नवलखा की याचिका पर सुनवाई से इंकार कर चुके हैं।
गौरतलब है कि बीते सोमवार को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने गौतम नवलखा की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। इसके लिए चीफ जस्टिस ने कोई कारण भी नहीं बताया था। इसके बाद ही अन्य जजों ने भी खुद को सुनवाई से अलग कर लिया है।
बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस रंजीत मोरे और जस्टिस भारती डांगरे की डिविजन बेंच ने पाया कि एडिशनल पब्लिक प्रोसिक्यूटर अरुणा पई द्वारा सीलबंद लिफाफे में जो दस्तावेज पेश किए गए हैं, उनमें गौतम नवलखा के खिलाफ प्रथम दृष्टया कुछ मैटिरियल है। वहीं पुलिस का भी दावा है कि उनके पास ऐसे सबूत हैं, जो दिखाते हैं कि नवलखा के माओवादी साजिश के साथ भी ‘गहरे संबंध’ हैं।
साल 2017 में भीमा-कोरेगांव हिंसा के मामले में गौतम नवलखा और कुछ अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। 31 दिसंबर 2017 को भीमा कोरेगांव में एल्गर परिषद की बैठक आयोजित की गई थी, जिसके अगले दिन ही भीमा कोरेगांव में हिंसा शुरू हो गई थी। गौतम नवलखा पर नक्सलियों के साथ संबंध रखने के भी आरोप हैं।
भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने पांच प्रमुख वामपंथी सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था। इन सामाजिक कार्यकर्ताओं में पी.वारवरा राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, वेरोन गोंजालवेज और गौतम नवलखा का नाम शामिल था। पुलिस का आरोप है कि इन सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा एल्गर परिषद के आयोजन के लिए फंड दिया गया। इसी एल्गर परिषद कार्यक्रम के बाद हिंसा भड़की थी।

