1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को गुरुवार को बड़ी राहत मिल गई। दिल्ली की राउज एवेन्यु अदालत ने उन्हें उस केस में बरी कर दिया है, जिसमें उन पर जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों में भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप था। यह फैसला विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह (Dig Vinay Singh) ने सुनाया।
अदालत ने इस मामले में पिछले साल दिसंबर में सभी पक्षों की सुनवाई पूरी कर ली थी और 22 जनवरी के लिए फैसला सुरक्षित रख लिया गया था, जिसे अब सुनाया गया है। इंसाफ के लिए लड़ रहे एक पीड़ित परिवार की महिला सदस्य फैसला सुनकर रो पड़ीं। उन्होंने कहा, “हमें इंसाफ क्यों नहीं मिल रहा है? कोर्ट ने उन्हें बरी क्यों कर दिया? हमारे 11 लोग मारे गए थे।”
पीड़ित परिवार की एक अन्य महिला सदस्य ने कहा, “मैंने अपने परिवार के 10 सदस्यों को खो दिया। सज्जन कुमार को मौत की सजा क्यों नहीं दी गई?.. हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे…”
1984 सिख विरोधी दंगा: 28 साल पहले 88 दोषियों को 5 साल की हुई थी सजा, हाई कोर्ट ने भी रखा बरकरार
इस मामले की शुरुआत फरवरी 2015 में हुई थी, जब एक विशेष जांच दल (एसआईटी) ने 1984 के दंगों के दौरान दिल्ली के जनकपुरी और विकासपुरी में हुई हिंसा से जुड़ी शिकायतों के आधार पर सज्जन कुमार के खिलाफ दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की थीं। इनमें से पहली प्राथमिकी जनकपुरी इलाके की थी। आरोप था कि 1 नवंबर 1984 को वहां सोहन सिंह और उनके दामाद अवतार सिंह की हत्या कर दी गई थी और उस समय हिंसा भड़काने में सज्जन कुमार की भूमिका थी। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध सबूतों और गवाहियों के आधार पर उन्हें इस मामले में दोषी नहीं माना और बरी कर दिया।
इस मामले में बरी होने के बावजूद, कुमार जेल में ही हैं। पिछले साल 25 फरवरी को, एक ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दंगों के दौरान दिल्ली के सरस्वती विहार इलाके में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरनदीप सिंह की हत्या के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हालांकि अपराध गंभीर था, लेकिन यह “दुर्लभ से दुर्लभतम” श्रेणी में नहीं आता था जिसके लिए मौत की सजा दी जाए।
ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा था कि सरस्वती विहार मामला हिंसा के एक लगातार पैटर्न का हिस्सा था जिसके लिए कुमार को पहले 17 दिसंबर, 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। उस मामले में, हाई कोर्ट ने उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पालम कॉलोनी में दंगों के दौरान पांच लोगों की मौत के लिए दोषी ठहराया था।
नानावती आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 1984 के दंगों के संबंध में दिल्ली में 587 FIR दर्ज की गईं, जिनमें 2,733 लोगों की जान चली गई थी। इनमें से, लगभग 240 मामले “पता नहीं चलने” के कारण बंद कर दिए गए और 250 मामलों में बरी कर दिया गया। केवल 28 FIR में सजा हुई, जिससे लगभग 400 लोगों को दोषी ठहराया गया। कुमार सहित लगभग 50 लोगों को हत्या का दोषी ठहराया गया था। (PTI Input)
