पंजाब के किसान चाहते हैं कि बॉर्डर पर लगे सुरक्षा घेरे (Security Fence) को पाकिस्तान की सीमा के करीब ले जाया जाए। सीमावर्ती इलाकों के ये किसान लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि बाड़ को अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब लाया जाए। सरकार अगर किसानों की बात मान लेती है तो यह पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र के किसानों के लिए बड़ी राहत होगी। इससे बाड़ के उस पार स्थित हजारों एकड़ खेती योग्य भूमि पर बिना किसी रुकावट के खेती की जा सकेगी।
पंजाब की 532 किलोमीटर लंबी सीमा पाकिस्तान से लगती है जो कांटेदार तारों की बाड़ से सुरक्षित है। बाड़ और सीमा के बीच पंजाब के किसानों की 21,500 एकड़ और सरकार की लगभग 10,000 एकड़ भूमि स्थित है। इस भूमि पर खेती करने वाले किसानों को सालों से प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। प्रतिबंधित भूमि तक पहुंच प्रदान करने वाले द्वार वर्तमान में सप्ताह के निर्धारित दिनों में कुछ घंटों के लिए किसानों के लिए खोले जाते हैं। हालांकि, सीमा के निकट काम करने वाले लोगों की संख्या और अपनी जमीन की जुताई के लिए ले जाने वाले ट्रैक्टरों की संख्या पर भी प्रतिबंध हैं।
बीएसएफ प्रोटोकॉल के अनुसार, बाड़ पार करने वाले प्रत्येक ट्रैक्टर के साथ दो किसान गार्ड का होना अनिवार्य है। इससे भी प्रतिदिन अपने खेतों तक पहुंचने वाले किसानों की संख्या सीमित हो जाती है। सीमावर्ती इलाकों के ये किसान लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि बाड़ को अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब लाया जाए। उनका कहना है कि इस कदम से उनकी जमीन तक पहुंच की समस्या भी कम हो जाएगी।
पढ़ें- सीमा से सटे गांवों में पुलिस अधिकारियों को 50 रातें बिताने के निर्देश
कब लगाई गई सीमा पर बाड़?
पंजाब में उग्रवाद के चरम पर होने के दौरान, 1988 में सबसे पहले गुरदासपुर, अमृतसर और फिरोजपुर जिलों की सीमा पर बिजली के तारों से बनी बाड़ लगाई गई थी। इसके प्रमुख उद्देश्य घुसपैठ, उग्रवाद और मादक पदार्थों की तस्करी पर अंकुश लगाना था। बाद में, मूल तीन जिलों से तीन और जिले अलग कर दिए गए – तरन तारन, फाजिल्का और पठानकोट। इसका मतलब है कि अब यह बाड़ पंजाब के छह जिलों में सीमावर्ती समुदायों को प्रभावित करती है। ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी का स्वरूप बदल गया है। सीमा गश्त और निगरानी में भी बदलाव आया है इसलिए, किसान तर्क देते हैं कि ऐसी स्थिति में बाड़ को सीमा के करीब ले जाना अधिक तर्कसंगत है।
खासा गांव के किसान चरणजीत सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “कुछ गांव ऐसे हैं जहां 500-700 एकड़ ज़मीन बाड़ के ठीक पीछे है। किसान थका देने वाली जांचों से गुज़रने के बाद ही बाड़ पार करते हैं। यह रोज़ की बात है। जब इन खेतों में मशीनें ले जानी होती हैं तो कई सुरक्षा जांचें होती हैं। इसमें समय लगता है, फिर फ़सल खेतों से निकाली जाती है। ऐसे में यह प्रक्रिया लंबी हो जाती है।” उन्होंने कहा , “सुरक्षा और निगरानी के लिए बाड़ लगाना आवश्यक है। हालांकि, इसे पीछे धकेल देना चाहिए। केंद्र के पास रक्षा के लिए बड़ा बजट है।”
बाड़ को अभी तक क्यों नहीं हटाया गया?
बाड़ को पीछे खिसकाने का मुद्दा पिछले कई वर्षों से बार-बार उठता रहा है। साल 2023 में बीएसएफ और गृह मंत्रालय इस तरह के प्रस्ताव पर सक्रिय रूप से विचार कर रहे थे। ऐसा करना कहने में जितना आसान है, उतना आसान है नहीं। नाम न छापने की शर्त पर एक बीएसएफ अधिकारी ने बताया कि लगभग 40 साल पुरानी वह बाड़ जर्जर हालत में है। उन्होंने कहा, “अगर इसे हटाकर पीछे धकेला गया तो यह कारगर नहीं होगी। सरकार को नए सिरे से कांटेदार तार भी खरीदने पड़ेंगे।”
पढ़ें- ड्रोन-AI से बदलेगा ग्रामीण भारत, 3.27 लाख गांवों का डिजिटल नक्शा तैयार
