पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार बनने पर लोगों को उम्मीद जगी थी की अब सेना के साये से निकलकर वहां की सरकार भारत से संबंध सुधारने के प्रयास करेगी। लेकिन इमरान की टीम वाले पकिस्तान के नए नेता जल्द ही भारत विरोध के अपने पुराने एजंडे पर लौट गए। हाल में वहां के विदेश मामलों के मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर को लेकर जिस तरह से कवायद शुरू की है, उसने भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिहाज से आग में घी का काम किया है। लंदन में उन्होंने कश्मीर को लेकर दो आयोजनों में हिस्सा लिया है और भारत पर हमले किए हैं। लंदन जाने के पहले उन्होंने कश्मीरी अलगवादी नेताओं से बात की। अलगाववादी नेताओं से बातचीत में कुरैशी ने कश्मीर मुद्दे को विश्व मंच पर उठाने की पाकिस्तान की योजना पर तफ्सील से चर्चा की। चार फरवरी को लंदन में यह दिखा भी।

कुरैशी की इस कवायद पर भारत ने तीखी नाराजगी जताई है। भारत हमेशा से कहता रहा है कि कश्मीर लिपक्षीय मुद्दा है और किसी तीसरे पक्ष के लिए कोई स्थान नहीं। अपनी लंदन यात्रा में कुरैशी ने इंग्लैंड सरकार के साथ कुछ आधिकारिक बैठकों की योजना बनाई थी। भारत के विरोध के बाद इंग्लैंड आधिकारिक बैठकों से पीछे हट गया। नई दिल्ली और इस्लामाबाद स्थित ब्रिटिश हाई कमीशनों के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी निजी यात्रा पर लंदन में हैं। उनका सरकार के साथ किसी तरह की आधिकारिक मुलाकात का कार्यक्रम नहीं है। कश्मीर के मुद्दे पर ब्रिटिश हाई कमीशन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के मसले का हल सिर्फ भारत-पाकिस्तान ही बातचीत कर निकाल सकते हैं।

दरअसल, आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान हाल के वर्षों में जिस तरह से अलग-थलग पड़ा है उसी के काट के तौर पर उसने दबाव बनाने के लिए भारत विरोधी अभियान की नए सिरे से शुरुआत की है। इसके पहले नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों में भी पाक ने यूरोपीय देशों, कनाडा, अमेरिका में खालिस्तान, कश्मीर के मुद्दे पर भारत के खिलाफ रैलियां आयोजित की। बाद में भारत के बढ़ते रसूख की वजह से इसमें काफी कमी आ गई थी।

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान फिर से वैसी ही कोशिश कर रहा है लेकिन भारत कूटनीतिक तौर पर उस पर पानी फेरने के लिए पूरी तरह से तैयार है। इसका उदाहरण हाल ही में वाशिंगटन में तब देखने को मिला जब पाकिस्तान समर्थक खालिस्तानियों से काफी ज्यादा संख्या में भारतीय मूल के लोग पहुंच गए। ऐसी ही स्थिति लंदन में हुई जहां खालिस्तान समर्थकों ने भारत के झंडे भी जलाए। कश्मीरी अलगाववादियों ने भी अलग से ऐसा ही किया। इन दोनों में पाकिस्तान सरकार के विदेश मंत्रालयों के अधिकारियों की भूमिका सामने आई।

भारत ने पहले वाशिंगटन और फिर ब्रिटेन में हुई इन घटनाओं को लेकर सख्त शब्दों में अपनी चिंताओं से अवगत कराया। पाकिस्तान के इंग्लैंड दौरे के मद्देनजर भारत ने खासतौर पर ब्रिटिश अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क बना रखा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार के मुताबिक, ब्रिटेन हमारा बेहद महत्त्वपूर्ण रणनीतिक पार्टनर है। हम गंभीरता से उन्हें यह बता रहे हैं कि उनकी जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए हो रहा है।

ब्रिटिश सांसद की भूमिका: ब्रिटेन की संसद में कश्मीर का मुद्दा लाने की बात कहां से उठी, यह एक बड़ा सवाल है। इस बहस की मांग करने वाले ब्रिटिश सांसद डेविड, ब्रिटेन की संसद में ब्राडफोर्ड ईस्ट के प्रतिनिधि हैं। ब्राडफोर्ड ईस्ट वह इलाका है, जहां पर अधिकतर पाकिस्तान मूल के लोगों का निवास है। माना जा रहा है कि इस इलाके के लोगों ने ही अपने सांसद पर कश्मीर मुद्दे को लेकर बहस का दबाव बनाया है।