कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के द्वारा उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिव सेना को समर्थन देने का फैसला काफी चर्चा में है। इस फैसले की वजह से एमएनएस और शिवसेना (यूबीटी) के बीच तनाव वाली स्थिति बन गई है। इन दोनों ही पार्टियों ने हाल ही में हुए बीएमसी चुनाव में मिलकर चुनाव लड़ा था।
कल्याण-डोंबिवली नगर निगम महत्वपूर्ण राजनीतिक नगर निगम है। इस इलाके को उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के प्रभाव क्षेत्र वाला इलाका माना जाता है। महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण भी इसी इलाके से आते हैं।
एमएनएस के इस कदम पर शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं ने नाराजगी जताई और राज ठाकरे की पार्टी के भीतर से भी इसके खिलाफ आवाज सुनाई दी लेकिन अभी भी एमएनएस और शिवसेना (यूबीटी) का गठबंधन ना तो टूटा है और ना ही एमएनएस ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना को दिया गया समर्थन वापस लिया है।
ऐसे में सवाल यह है कि कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में एमएनएस ने शिवसेना को समर्थन आखिर क्यों दिया?
हुआ यह था कि कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में बीजेपी ने एमएनएस के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कई नेताओं को पहले ही अपने साथ मिला लिया था और इस वजह से राज ठाकरे की पार्टी को कई वार्डों में उम्मीदवारों को उतारना मुश्किल हो गया था।
महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव के बाद सबसे बड़े ‘लूजर’ साबित हुए अजित पवार
इस दौरान बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच जब सीटों का बंटवारा हुआ तो शिंदे गुट के कई नेताओं को टिकट नहीं मिला क्योंकि उनके वार्ड बीजेपी के पास चले गए थे। एमएनएस ने शिवसेना के इन्हीं नेताओं को चुनाव लड़ा दिया था। चुनाव प्रचार के दौरान शिवसेना शिंदे गुट ने इन उम्मीदवारों का समर्थन किया और उनकी मदद भी की।
122 सदस्यों वाले इस नगर निगम में बीजेपी ने 50, शिवसेना (शिंदे गुट) ने 53, एमएनएस ने 5 और शिवसेना (यूटीबी) ने 11 सीटें जीतीं।
चुनाव नतीजों के बाद एमएनएस के पांच पार्षदों में से चार ने शिवसेना शिंदे गुट से संपर्क किया। शिवसेना नेता राजेश कदम के मुताबिक, पांच में से एमएनएस के तीन पार्षद चुनाव से ठीक पहले राज ठाकरे की पार्टी में आए थे और वे वापस लौटना चाहते थे। सूत्रों के मुताबिक, एमएमएस के चौथे पार्षद भी एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ आना चाहते थे।
दिल्ली में नरेंद्र महाराष्ट्र में देवेंद्र! निकाय चुनाव की शानदार जीत में फड़नवीस की भूमिका
क्या चाहती थी शिवसेना?
सूत्रों के मुताबिक, शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना भी चाहती थी कि एमएनएस ना टूटे और उसके साथ गठबंधन करे वरना कल्याण-डोंबिवली नगर निगम पर बीजेपी का कब्जा हो सकता है। राजनीतिक हालात को देखते हुए एमएनएस नेतृत्व ने इसे लेकर तुरंत फैसला किया।
पूर्व विधायक राजू पाटिल ने राज ठाकरे को इस बारे में बताया और एमएनएस ने शिवसेना को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। हालांकि इसे स्थानीय फैसला बताया गया लेकिन उद्धव ठाकरे भी इस बारे में जानते थे। यह भी दावा किया गया कि शिवसेना (यूबीटी) के चार पार्षद शिंदे गुट के साथ जाने वाले थे।
22 जनवरी को स्थिति तब पूरी तरह बदल गई जब लॉटरी के जरिए कल्याण-डोंबिवली नगर निगम के महापौर पद के लिए चुनाव किया गया। यह सीट एसटी वर्ग के पास चली गई। बीजेपी के पास 50 पार्षद हैं लेकिन उनमें से कोई भी आदिवासी वर्ग से नहीं है। ऐसे में बीजेपी यहां अपना मेयर नहीं बना पाएगी लेकिन एमएनएस के पास एसटी वर्ग से शीतल मंधारी पार्षद हैं।
बीजेपी के लिए बंद हुआ रास्ता
अगर एमएनएस बीजेपी का समर्थन कर देती तो शीतल बीजेपी के समर्थन से महापौर तो बन जातीं लेकिन यह नगर निगम बीजेपी के पास चला जाता और यह प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण के लिए बड़ी जीत होती। लेकिन अब एमएनएस के इस फैसले से इस महत्वपूर्ण नगर निगम में बीजेपी का महापौर बनने का रास्ता बंद हो गया है।
अगर इस नगर निगम में बीजेपी के समर्थन से महापौर बन जाता तो बीएमसी में भी बीजेपी की स्थिति मजबूत हो जाती लेकिन शिंदे गुट ने साफ संदेश दिया है कि चुनाव के नतीजों के बाद भी नए समीकरण बन सकते हैं।
शिंदे गुट और बीजेपी नेतृत्व के बीच लड़ाई
कल्याण-डोंबिवली नगर निगम एकनाथ शिंदे का गृह क्षेत्र तो है ही, उनके बेटे श्रीकांत शिंदे कल्याण लोकसभा सीट से सांसद हैं। इस इलाके में शिंटे गुट और बीजेपी के स्थानीय नेतृत्व के बीच राजनीतिक लड़ाई चल रही है।
एकनाथ शिंदे के लिए मुंबई महानगर के इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में जीत हासिल करना जरूरी है। वहीं, पार्टी यह भी दिखाना चाहती है कि बीजेपी के बिना भी वह कल्याण-डोंबिवली जैसे बड़े नगर निगम चला सकती है। बीजेपी के लिए भी यह नगर निगम बहुत अहम है। अगर यहां बीजेपी का मेयर बनता तो इससे वह मजबूत राजनीतिक संदेश दे सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
