झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के बेनिसागर गांव में संजू देवी अपने घर में काली शॉल ओढ़े बैठी हैं। घर के बाहर कुछ लोग बांस और धान की पराली से अर्थी बना रहे हैं। घर में गहरा सन्नाटा है। महिलाएं एक-दूसरे के पास बैठी हैं, मानो सहारा ढूंढ रही हों। घर के बीच में एक आदमी के कपड़े, जूते और दूसरी चीजें रखी हैं। ये सब संजू देवी के पति प्रकाश दास की हैं। प्रकाश जेसीबी चलाते थे और पांच लोगों के परिवार में वही अकेले कमाने वाले थे। 9 जनवरी को एक बेकाबू हाथी ने उन्हें मार डाला। संजू देवी कहती हैं, “मुझे नहीं पता था कि जिस आदमी की फोटो आई थी, जिसका सिर शरीर से करीब 50 मीटर दूर मिला था, वह मेरे पति ही थे।”

प्रकाश दास उन करीब 20 लोगों में से एक हैं, जिनकी मौत इसी हाथी के हमले में हुई है। इनमें चार बच्चे भी शामिल हैं। ये घटनाएं झारखंड और ओडिशा की सीमा पर हुईं। आखिरी हमला 9 जनवरी को बताया गया, लेकिन अब यह साफ नहीं है कि हाथी इस समय कहां है। झारखंड में इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार हमले बेहद हिंसक रहे। रात-रात भर हाथी के हमलों से लोगों में डर फैल गया है। कई गांवों से सैकड़ों लोग अपने घर छोड़कर भाग चुके हैं। कुछ लोगों ने ऊंचे मचान बना लिए हैं ताकि रात में ऊपर रह सकें। वन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि इतने खतरनाक और अचानक हमले हाल के वर्षों में नहीं देखे गए।

अतिक्रमण की भेंट चढ़ती जिंदगी: पश्चिमी सिंहभूम में हाथी का हमला और वन विभाग की सुस्ती पर उठते सवाल

वन विभाग का मानना है कि यह हाथी अपने झुंड से बिछड़ गया है और बहुत खतरनाक हो चुका है। अधिकारियों को शक है कि वह ‘मस्त’ अवस्था में है। उसे पकड़ने या ढूंढने की कोशिश लगातार चल रही है, लेकिन घने जंगलों के कारण उसका पता लगाना मुश्किल हो रहा है। चाईबासा और कोल्हान क्षेत्र के वन अधिकारी आदित्य नारायण कहते हैं, “हमारी टीमें दिन-रात खोज में लगी हैं। गांव के मुखिया और स्थानीय लोगों से भी सूचना तंत्र बनाया गया है। लेकिन हमले अचानक रुक गए और कोई पक्की जानकारी नहीं मिली।”

बेनिसागर के मुखिया लक्ष्मण चातर कहते हैं, “वन विभाग ने हमें जंगल में जाने से मना किया है। अब पुरुष भी अंधेरा होने से पहले घर लौट आते हैं। महिलाएं लकड़ी लेने नहीं जातीं। अब तो कुत्ते भी भौंकते हैं, तो लगता है कहीं हाथी तो नहीं आ गया।” अब लोग अकेले बाहर नहीं निकलते। बच्चे घरों में ही रहते हैं। गांवों में पहरे की व्यवस्था की गई है। वन विभाग ने टॉर्च और पटाखे दिए हैं ताकि हाथी को भगाया जा सके।

एक खौफनाक रात

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 18 सालों में झारखंड में हाथियों के हमलों से कम से कम 1,270 लोगों की मौत हुई है। इस दौरान करीब 150 हाथी भी मारे गए। राज्य में हाथियों की संख्या 550 से 600 के बीच मानी जाती है। पश्चिमी सिंहभूम सबसे ज्यादा प्रभावित जिला है। यहां घने जंगल भी हैं और खनन भी बड़े पैमाने पर होता है।

गोइलकेरा प्रखंड के सोवान गांव में मानकी बहांदा 30 फीट ऊंचे मचान पर तीन अन्य लोगों के साथ बैठे हैं। ऊपर तिरपाल लगा है। चारों ओर सन्नाटा है और हर छोटी आवाज पर सब चौंक जाते हैं। 5 जनवरी की रात हाथी के हमले में मानकी बहांदा के परिवार के लगभग सभी लोग मारे गए — बहू और चार छोटे बच्चे। उनका बेटा बच गया, लेकिन गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है। मानकी कहते हैं, “अब यही मचान हमारी सुरक्षा है। हमें उम्मीद है कि ऊंचाई पर हाथी नहीं पहुंच पाएगा।”

6 जनवरी की रात करीब 10 बजे जब हाथी नोआमुंडी प्रखंड के बाबरिया गांव पहुंचा, तब तक वह 10 लोगों की जान ले चुका था। यहां उसने पांच और लोगों को मार डाला। इनमें आठ साल की सुशीला मेराल का लगभग पूरा परिवार शामिल था।

सुशीला के चाचा राम मेराल बताते हैं कि सुशीला अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ ‘गुन्यू’ पर सो रही थी। यह धान की कटाई के समय बनाया जाने वाला अस्थायी मंच होता है। हाथी ने अचानक हमला किया। सुशीला का पैर बुरी तरह जख्मी हो गया और खून बह रहा था। वह खुद को घसीटते हुए नीचे आई और मदद के लिए चिल्लाने लगी।

पड़ोसी माडे पुर्ति बताते हैं, “लोग डर गए थे। कहा गया कि अगर उसे घर में लाए तो हाथी खून की गंध से फिर हमला करेगा। जब तक गांव के लोग संभलते, परिवार के ज्यादातर लोग मारे जा चुके थे।” इस हमले में सिर्फ सुशीला, उसका भाई जैपाल और पड़ोसी का बेटा बच पाए।

बाबरिया गांव के एक और हिस्से में गुरु चरण लागुरी के परिवार में मातम है। गुरु चरण किसान थे। वे रात में बाहर गए थे, तभी हाथी से सामना हो गया। हाथी ने उन्हें करीब 60 मीटर दूर फेंक दिया और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। उनका पांच साल का बेटा अब भी यह नहीं समझ पाता कि उसके पिता अब नहीं रहे। उनकी बहन जानो लागुरी कहती हैं, “एक ही रात में सब कुछ बदल गया।”

बड़ा पासेया गांव में, जो वहां से 10–15 किलोमीटर दूर है, हाथी ने रात एक बजे हमला किया। यहां भी लोग अस्थायी मंच पर सो रहे थे। 65 साल के उदय बोबोंगा बताते हैं कि पहले कुत्ते भौंके। उसी वक्त मंगल बोबोंगा बाहर गए थे। हाथी ने उन पर हमला कर दिया। बाकी लोग किसी तरह बच गए। सुबह मंगल का शव मिला, जिसका एक पैर पूरी तरह कट चुका था।

हल्दिया गांव में 18 साल के ट्रैक्टर चालक दामोदर कुल्डी की मौत से गांव शोक में है। दामोदर हाथी की निगरानी करने वाले एक अनौपचारिक दल में शामिल था। पड़ोसी दिनेश हेम्ब्रम बताते हैं कि एक दिन हाथी का पीछा करते समय वह जंगल में अचानक गायब हो गया। ज्यादातर लोग पीछे हट गए, लेकिन दामोदर आगे बढ़ गया। हाथी ने उसी पर हमला कर दिया। दामोदर के अंतिम संस्कार के समय उसकी गर्भवती पत्नी अमृता बेसुध है। वह रोते हुए कहती है, “मैंने उसे मना किया था। मुझे मन में डर लग रहा था कि कुछ गलत होगा।”

हाथी की तलाश

वन विभाग ने हाथी को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है। पश्चिम बंगाल से महावत बुलाए गए हैं। थर्मल ड्रोन जैसी तकनीक का भी इस्तेमाल हो रहा है। ओडिशा की टीमें और वाइल्डलाइफ एसओएस के विशेषज्ञ भी मदद के लिए तैयार हैं। वन अधिकारी आदित्य नारायण कहते हैं, “यह हाथी बहुत आक्रामक व्यवहार कर रहा है। आमतौर पर हाथी इंसानी बस्तियों से दूर रहते हैं, लेकिन यह सीधे गांवों की ओर आ रहा है और रास्ते में जो भी आता है, उस पर हमला कर देता है।”

विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगलों की कटाई, खनन, उद्योग और शहरों के फैलाव से हाथियों के रास्ते टूट गए हैं। इसी वजह से हाथी इंसानी इलाकों में घुसने लगे हैं। दिसंबर 2025 में प्रकाशित एक शोध में कहा गया है कि झारखंड में खनन और उद्योगों के कारण हाथियों का प्राकृतिक आवास बंट गया है। इससे इंसानों और हाथियों के बीच टकराव बढ़ा है।

इसका असर दोनों पर पड़ रहा है – हाथियों पर भी और गांव वालों पर भी। फसलें बर्बाद हो रही हैं, घर टूट रहे हैं और लोगों की जान जा रही है। पश्चिमी सिंहभूम, गिरिडीह और हजारीबाग जैसे जिलों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है। गुस्साए गांव वाले अब अधिकारियों पर नाराजगी निकाल रहे हैं। बेनिसागर गांव में प्रकाश दास की मौत के बाद अधिकारियों और ग्रामीणों के बीच बातचीत तनावपूर्ण रही। गांव के मुखिया लक्ष्मण चातर कहते हैं, “लोगों को लग रहा है कि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है।”