सुमन केशव सिंह

ग्रामीण महिलाएं शहरी महिलाओं की तरह परिवार को देखते हुए खेतों में भी किसानी की जिम्मेदारी संभालती हैं। दिल्ली में अभी हाल में हुए किसान आंदोलनों के दौरान महिला किसानों की मौजूदगी पुरुषों के बराबर नजर आई। इस बार हमने उन महिलाओं से बातचीत की जो बिना किसी श्रेय की उम्मीद के अपनी मेहनत के बल पर देश को मजबूती प्रदान कर रही हैं। हरियाणा के करनाल की राजबाला देवी बताती हैं कि ‘मरद तो खेतों में जावे भी ना हैं, जाना तो हमें ही पड़े’। उन्होंने बताया कि उनके पास करीब 20 बीघे खेत हैं। परिवार में चार लोग हैं, खेती बहुत कम होती है। खेती में फायदा अब नहीं रहा है, इसलिए बेटा और पति फैक्ट्री में काम करने जाते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसा ही हाल अब हरियाणा के ज्यादातर खेतिहर किसानों का है। पहले भी महिलाएं ही खेती में पुरुषों की सहायता करती थीं, लेकिन अब पुरुषों पर रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए खेती से ज्यादा फैक्ट्रियों में काम करने का दबाव है।

घर और खेत दोनों ही देखने की जिम्मेदारी: करनाल की ही सुदेश देवी बताती हैं कि हम बच्चों को देखने के साथ ही खेती भी देखते हैं। सुबह जल्दी उठकर देखना पड़ता है कि किसी ने जानवर तो नहीं छोड़ दिया? किसानों की मांगों को लेकर संसद घेरने दिल्ली आर्इं नीलम देवी का भी यही कहना है कि हम तो सिर्फ मर्दों का साथ देवे हैं। कटाई के बाद फसल पुरुष ही मंडी ले जाते हैं लेकिन हमें सरकार से नाराजगी है। हमें हमारी मेहनत का पूरा पैसा नहीं मिल रहा। नीलम के पास चार किले यानी करीब 22 बीघे खेत हैं। खेती में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की कितनी भागीदारी है के सवाल पर उन्होंने ने कहा कि हरियाणा के खेतों में आकर देखिए, वहां मजदूर और किसान दोनों ही महिलाएं ज्यादा नजर आएंगी। पुरुष फैक्ट्री में काम करने लगे हैं। उन्होंने हरियाणा के परिवेश की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि वहां ज्यादा काम महिलाओं के ही जिम्मे है। उन्हें घर-परिवार तो देखना ही पड़ता है। गाय-भैंस का दूध निकालने से लेकर भैंसों को चारा देना और खेत के सारे काम भी उन्हें ही करने पड़ते हैं। नीलम कहती हैं कि अब ज्यादातर किसानों के पास खेत नहीं बचे वो आपसी बंटवारे में छोटे हो चुके जिन पर फसल लगाना भी अब आसान नहीं रहा है। उन्होंने बताया कि हमारे यहां महिलाएं हल भी चलाती हैं और ट्रैक्टर भी।

कर्जे का बोझ पर गांव नहीं छोड़ना चाहतीं: इधर, बिहार के नवादा जिले से आए बटाई किसानों के महिला दल का कहना है कि सरकार की योजनाएं उन तक नहीं पहुंच पा रही हंै। ज्यादातर खेती बटाई या पट्टे की जमीन पर होती है। खेतिहर महिला मजदूर खेतों में काम करती हैं, उनके पति शहरों में मजदूरी करते हैं। इस दल ने बताया कि सरकारी सेवाओं का लाभ किसानों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी जिन पर है, वही बंदरबांट में लगे हुए हैं।
विनंती देवी भी बटाई किसान हैं और गांव छोड़कर शहर में मजदूरी नहीं करना चाहती लेकिन उन्हें खेती में नुकसान हो रहा है और परिवार कर्जे में है। सरकार जो भी योजना चलाती है, वो जमीदारों को ही फायदा पहुंचती है। वहीं, दूसरी महिला किसान मालती देवी बीच में ही बोल पड़ती हैं ‘सारा मेहनत हमनी करें, आधा फसल जमींदार के देवे पड़ता है। उस पर भी जमींदार को भरोसा नहीं होता है। फसल उगाने में हमारी जान चली जाती है और फसल कटवा के जमींदार अपने घर रखवा लेता है’।

कर्जा नहीं देने पर बर्तन धुलवाते हैं साहूकार: दल की तीसरी सदस्य मानो देवी कहती हैं ‘हम लोग फसल उगाते हैं, रोग से, कीड़ा से, पाला से, सूखा से और जानवरों से बचाते हैं। अगर इ फसल खराब हो गया तो हम जो कर्जा उठाए हैं उ नहीं दे पाएंगे। साहूकार 100 रुपया पर 10 रुपया मांगता है। गहना रखने पर 100 पर 5 रुपया लेता है। कर्जा नहीं चुका पाए तो घर से बुलवाकर नौकर की तरह घर का काम करवाता है, बरतन मजवाता है। बैंक हमको कर्जा नहीं देता क्योंकि हमारे पास जमीन नहीं है’। आप बैंक से कर्ज क्यों नहीं लेती हैं? इस सवाल पर कौशल्या गुस्से में कहती हैं ‘बैंक मनेजर कर्जा के लिए 100 रुपया पर दस रुपया काट कर देता है, इसके बाद दलाल भी 100 पर 10 रुपया लेता है, कहता है कि जिनके पास खेत है, उ लोग को सरकार कर्जा देता है।’ कौशल्या आगे कहती हैं कि खेत में हम फसल रोपे हैं, बीज डाले हैं, खाद डाले हैं, पानी के लिए पंप, डीजल सब किए और फसल खराब हुआ तो मुआवजा सरकार जमींदार को देती है’।