कोलकाता स्थित आईपैक (IPAC) के कार्यालय और इसके निदेशक प्रतीक जैन के घर पर छापे के मुद्दे पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का आरोप है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पुलिस के साथ मिलकर कथित तौर पर कुछ अहम सबूत अपने साथ ले गईं। यहां तक दावा किया गया कि एक अधिकारी का मोबाइल फोन भी वे साथ ले गईं।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हुई, जहां ईडी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए। सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने ईडी के उन आरोपों को गलत बता दिया जहां दावा हुआ कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोई जरूरी दस्तावेज अपने साथ लेकर गई थीं। उन्होंने कहा कि यह आरोप पूरी तरह से गलत हैं। सिब्बल ने दलील दी कि ईडी के अपने ही पंचनामा से स्पष्ट होता है कि रेड वाले दिन दोपहर 12:05 बजे तक ईडी ने कुछ भी जब्त नहीं किया था। मुख्यमंत्री कोई भी फाइल या दस्तावेज अपने साथ नहीं ले गई थीं।

कपिल सिब्बल ने बताया कि प्रतीक जैन का जो लैपटॉप था, उसमें चुनाव से जुड़ी जानकारियां थीं। ऐसे में केवल वही लैपटॉप और उनका निजी आईफोन साथ ले जाया गया। किसी तरह की जबरदस्ती या अवरोध उत्पन्न नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि पंचनामे पर खुद ईडी अधिकारियों के हस्ताक्षर मौजूद हैं और जो याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है, वह पंचनामा से बिल्कुल अलग कहानी पेश करती है।

आईपैक के संबंध में सिब्बल ने कहा कि उसमें पार्टी से जुड़ा मैटेरियल मौजूद था, इसी वजह से ईडी वहां पहुंची थी। उन्होंने ईडी की नीयत पर सवाल उठाते हुए यहां तक कहा कि एक सर्कुलर जारी किया जाना चाहिए, ताकि सीबीआई और ईडी अपने कुछ चुनिंदा पत्रकारों को सूचनाएं लीक न करें। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताई और कहा कि ऐसे मामलों में मीडिया का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कथित ‘कोयले घोटाले’ का भी जिक्र किया। जस्टिस जे मिश्रा ने पूछा कि क्या इस समय किसी घोटाले की जांच चल रही है। इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कोयले से जुड़े एक मामले में नकद लेन-देन हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि जिन लोगों से पूछताछ की गई, उनकी ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। एक हवाला चैनल भी सामने आया है, जिसके जरिए करीब 20 करोड़ रुपये के ट्रांसफर की बात कही गई है।

इसके बाद जस्टिस मिश्रा ने सवाल किया कि क्या आईपैक उसी कंपनी से जुड़ा है, जिसके साथ पहले प्रशांत किशोर जुड़े हुए थे। इस पर जवाब दिया गया कि हां, यह वही कंपनी है।

इसके अलावा सॉलिसिटर जनरल ने हाई कोर्ट में हुई सुनवाई का भी जिक्र किया और उस पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह देखना चाहिए कि हाई कोर्ट में आखिर हुआ क्या था। तुषार मेहता ने कहा कि जब लोकतंत्र की जगह “मॉबक्रेसी” हावी हो जाए, तो ऐसी स्थिति पैदा होती है। उनके मुताबिक, उस दौरान हाई कोर्ट में बड़ी संख्या में वकील और अन्य लोग घुस आए थे, जिससे बेंच को यह कहना पड़ा कि ऐसे माहौल में सुनवाई संभव नहीं है।

उन्होंने आरोप लगाया कि एक लीगल सेल के जरिए लोगों से भारी संख्या में कोर्ट पहुंचने को कहा गया था। इस पर जस्टिस मिश्रा ने सवाल किया कि “सभी को आने” का क्या मतलब है, क्या यह जंतर-मंतर है? इसके जवाब में तुषार मेहता ने कहा कि बाकायदा बसों और अन्य गाड़ियों की व्यवस्था की गई थी। हालात को देखते हुए एक्टिंग चीफ जस्टिस को आदेश देना पड़ा कि सिर्फ वही वकील कोर्ट में प्रवेश कर सकेंगे, जो इस मामले में पेश हो रहे हैं। हालांकि, सुनवाई लाइव टेलीकास्ट की गई, लेकिन ईडी के मुताबिक सुनवाई संतोषजनक नहीं रही। ईडी को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा और माइक्रोफोन बार-बार म्यूट हो रहा था।

माइक म्यूट होने के मुद्दे पर जस्टिस मिश्रा ने पूछा कि यह अधिकार तो कोर्ट के पास ही होता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि पहले भी सीबीआई अधिकारियों के साथ ऐसा हो चुका है। उन्होंने चिटफंड घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय सीबीआई अधिकारियों को पुलिस स्टेशन ले जाया गया था, मुख्यमंत्री धरने पर बैठ गई थीं और अधिकारी ठीक से अपनी ड्यूटी नहीं निभा पाए थे। उस मामले में आरोपियों की जमानत याचिका तक दायर कर दी गई थी। तुषार मेहता ने कहा कि उस वक्त भी कुछ मंत्रियों द्वारा कोर्ट में नारे लगाए गए थे और मौजूदा मामले में भी वैसा ही माहौल देखने को मिल रहा है।

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