रजत रानी मीनू
हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग के परिणाम के बाद पूरे देश में एक खुशी की लहर दौड़ती दिखी। शीर्ष चार स्थानों पर लड़कियों ने परचम लहराया। नौ सौ तेंतीस सीटों में से तीन सौ बीस पर लड़कियां उम्मीदवार आगे आईं। पिछले वर्षो की अपेक्षा यह प्रतिशत लड़कियों के पक्ष में बढ़ा है। जाहिर है, यह परिणाम स्त्री समुदाय की दृष्टि से और देश के हित में बेहतर है। मगर स्त्रियां आधी आबादी होने के बावजूद पचास फीसदी का आकंड़ा नहीं छू पाई हैं। इसके साथ अनेक सवाल भी उठ रहे हैं और अनेक शंकाओं का समाधान स्त्री समर्थकों को मिल गया है कि लड़कियों को अवसर दिए जाएं तो वे लड़कों से पीछे नहीं रहती हैं।
इस खुशी में भारतीय समाज की लड़कियों के प्रति मानसिकता दिखाई देती है। यानी लड़कियों को समाज ने समान अवसर नहीं दिए, इसलिए वे पिछड़ गईं। पिछड़ ही नहीं गईं, बल्कि स्त्री समुदाय के लिए कमतरी के मुहावरे भी गढ़े गए। उनका मजाक उड़ाया गया और बहुत चालाकी से उन्हें अवसरों से दूर किया जाता रहा है। इसीलिए लड़कियों को और उनके समर्थकों को बार-बार यह कहना पड़ता है कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं। आज भी लड़कियों को अपनी योग्यता का प्रमाण पत्र सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना पड़ रहा है, जबकि अवसर मिलने पर वे अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे रही हैं और यह सामान्य-सी बात है।
जिनका इतिहास में दमन, शोषण हुआ, वे आज भी असमानताएं झेलने को विवश
इस संदर्भ में देखें तो अवसरों की समानता लड़कियों को ही क्यों, देश के हर नागरिक को मिलनी चाहिए। जिनका इतिहास में दमन, शोषण किया गया और वे आज भी विभिन्न तरह की असमानताएं झेलने को जो विवश हैं। जो चार लड़कियां संघ लोकसेवा आयोग के परिणाम में आगे आई हैं, उनके माता-पिता ने उनके साथ शायद किसी तरह का भेदभाव नहीं किया होगा। इसके अलावा, वे ऐसे क्षेत्रों से भी अधिक हैं, जहां शिक्षा की सुगम व्यवस्था और इस कठिन परीक्षा को चुनौती देने के लिए वातावरण की अनुकूलता उनके परिवारों से मिली होगी। मगर सवाल यह भी है कि इस शानदार परिणाम के बाद क्या यह कह सकते हैं कि ये लड़कियां पूरे देश के, खासतौर पर शोषित-वंचित क्षेत्रों में रहने वाली लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती हैं?
सवाल यह है कि उच्च पदों पर पहुंचे कितने लोग होंगे जो पिछड़े माहौल में रहने वाली लड़कियों के बारे में जानते होंगे और उनके बारे में, जो सामाजिक अवसरों की असमानता के कारण पिछड़ गईं। उन लड़कियों और उनकी मांओं की संख्या इतनी अधिक है कि उनके आंकड़े इकट्ठा करना जरूरी नहीं समझा गया। जो पिछड़ गईं तो उनमें से बहुतों को तो बोध तक नहीं है कि उनकी नस्ल ने देश में झंडा गाड़ा है। वे और उनका समाज अनभिज्ञ है। कई बार तो लगता है जैसे वे किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हैं। उनकी दुनिया अलग है। ऐसी स्त्रियां दलित, आदिवासी, कुछ पिछड़ी जातियों की स्त्रियां ही नहीं, उनका पूरा समुदाय जैसे दूसरे लोक में जी रहा हो। उनको जीवन और शिक्षा के समान अवसर कब और कैसे उपलब्ध होंगे? वे कब गौरवान्वित होंगे?
कहा जा सकता है कि उनका प्रतिनिधित्व कम से कम संघ लोक सेवा आयोग में तो पूरा हो ही जाता है। इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता। मगर इससे जुड़े सवाल हैं कि एक तो यूपीएससी की सीटों की संख्या निश्चित हैं। उसमें भी अपनी रुझान और क्षमता पहचान कर ही कोई इस क्षेत्र में प्रयास करता है। बहुत सारी लड़कियों को इस क्षेत्र में किन्हीं कारणों से जाना ही नहीं था। सवाल है कि दूसरे समांतर क्षेत्रों में लड़कियां पहुंचती हैं, तब क्या इसी तरह का जश्न मनाया जाता है? मसलन, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, साहित्यकार, ज्ञान-विज्ञान, पत्रकारिता से जुÞड़े पेशे, व्यापार आदि? इन क्षेत्रों में स्त्रियां आई अवश्य हैं, मगर इनकी संख्या गिनी-चुनी है। पिछड़े शोषित-वंचित तबके की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व इन क्षेत्रों में आधा प्रतिशत भी नहीं है। जो इन क्षेत्रों में पहुंची हैं, क्या उन लड़कियों का सम्मान उसी तरह है?
समाज में वातावरण तो इस तरह का है कि लड़कियों के जन्म का जश्न भी बेटों की तरह नहीं मनाया जाता है। माता-पिता के मन में बेटी की चाहत की प्राथमिकता लड़कों की तरह है क्या? आज भी बहुत से ऐसे परिवार हैं जहां एक बेटे की चाहत में पांच-छह लड़कियों का जन्म हो जाता है और यह कह भी कहा जाता है कि हम तो बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं करते हैं। बहुत समय तक माया, लक्ष्मी, धनदेवी यानी मन को समझाने के लिए धन से संबंध रखने वाले नाम लड़कियों के रखे जाते थे। उसके बाद उनकी शिक्षा प्राथमिकता में नहीं होती।
दहेज के लिए पैसे इकट्ठा करने की चिंता माता-पिता को अधिक होती थी और आज भी है। पढ़ी-लिखी शिक्षक, प्राध्यापक, पत्रकार, डाक्टर, इंजीनियर के पद पर पहुंचने वाली मोटा पैसा कमाने वाली लड़कियों के माता-पिता को दहेज देना पड़ता है। क्या समाज में व्याप्त इस बुराई के बारे नहीं सोचना चाहिए?
