इंदिरा गांधी पर उन्हीं के अंगरक्षकों ने हमला कर दिया था। 31 अक्टूबर 1984 को उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया था। एक सिक्योरिटी गार्ड ने पांच तो दूसरे ने 25 गोलियां उन पर बरसा दी थीं। यह अटैक कैसे हुआ था और इंदिरा तब कहां थीं? पढ़िए, उनकी पुण्यतिथि पर यह कहानीः

सीनियर टीवी पत्रकार सागरिका घोष की किताब ‘इंदिरा – इंडियाज़ मोस्ट पावरफुल प्राइम मिनिस्टर’ में भी इस किस्से का जिक्र मिलता है। बुक के मुताबिक, 31 अक्टूबर 1984 को वह बुलेट प्रूफ वेस्ट नहीं पहने थीं। (जान के खतरे की आशंका और बार-बार मिलने वाली धमकियों के मद्देनजर उन्हें यह जैकेट पहनने के लिए कहा जाता था) वह दरवाजे के बाहर आईं और अकबर रोड दफ्तर की ओर बढ़ रही थीं। वह इसी रास्ते से रोज निकलती थीं।

इंदिरा जैसे ही गेट के नजदीक पहुंचीं, सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह उनके पास ही था। बेअंत सिंह भी नौ साल से उनके अंगरक्षकों में से एक था और उनके साथ विदेशी दौरों पर भी रह कर आया था। बहरहाल, इंदिरा ने हमेशा की तरह बेअंत को नमस्ते किया। जवाब में उसने अपनी रिवॉल्वर उन पर तान दी थी। ऐसे में उन्होंने पूछा- तुम ये क्या कर रहे हो?

एक सेकेंड की चुप्पी के बाद उसने फायर कर दिया। प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से पांच शॉट्स आए (इंदिरा को करीब से पांच गोलियां मारी गई थीं)। बेअंत की ओर से लॉन में एक और युवा कॉन्स्टेबल सतवंत सिंह (एक अन्य सिख) भी आ गया था। उसकी उम्र तब 22 साल थी। वह पंजाब के गुरदासपुर से लंबी छुट्टी लेकर लौटा था। मौके पर पहुंचते ही वह छोड़ा था घबराया, तभी बेअंत चिल्लाया- शूट! (गोली चलाओ…)

फिर क्या था, यह सुनते ही सतवंत ने अपनी ऑटोमैटिक स्टेन गन से 25 बुलेट्स दाग दीं। इंदिरा इस दौरान गोलियों से छलनी हो चुकी थीं और उनका शरीर का हर हिस्सा उस वक्त खून से लथ-पथ था। किताब में आगे पीटर उत्सीनव के हवाले से घटना के बारे में बताया गया कि उन्हें तीन सिंगल शॉट्स की आवाज आई थी। दफ्तर में लोगों ने कहा था कि यह पटाखों की आवाज है। वहीं, एक अन्य व्यक्ति के हवाले से बुक में बताया गया कि वह उस दिन को याद कर पागल हो जाते हैं।