सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा है कि न्यायाधीशों का तबादला पूरी तरह न्यायपालिका का अंदरूनी मामला है और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि तबादले केवल न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने के उद्देश्य से किए जाते हैं। इस दौरान उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली का भी बचाव किया।

पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा कि अगर इस सिद्धांत से हटकर काम किया गया, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि न्यायपालिका को हर तरह के बाहरी दबाव से दूर रखना बेहद जरूरी है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति भुयान ने चिंता जताई कि कुछ मामलों में कॉलेजियम के फैसलों में यह लिखा गया है कि किसी न्यायाधीश का तबादला सरकार के अनुरोध पर किया गया। उन्होंने इसे बहुत गंभीर और चिंताजनक बताया।

उनका कहना था कि जब कॉलेजियम खुद यह स्वीकार करता है कि तबादला सरकार की मांग पर हुआ है, तो यह एक ऐसे तंत्र में सरकारी दखल को दिखाता है, जिसे पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए।

उन्होंने इसे “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए कहा कि इससे कॉलेजियम प्रणाली की विश्वसनीयता कमजोर होती है। यह वही प्रणाली है, जिसे न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों में राजनीतिक या सरकारी हस्तक्षेप को रोकने के लिए बनाया गया था। न्यायमूर्ति भुयान इस व्याख्यान में “संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक शासन” विषय पर अपने विचार रख रहे थे।

अपने न्यायिक करियर का जिक्र करते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि उनका तबादला दो बार हुआ था। पहले गुवाहाटी स्थित उनके मूल उच्च न्यायालय से बॉम्बे उच्च न्यायालय में और फिर बॉम्बे से तेलंगाना उच्च न्यायालय में। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तबादलों को दंडात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मेरा तबादला दो बार हुआ और दोनों बार यह मेरे पक्ष में ही रहा, लेकिन यह बिल्कुल अलग बात है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का तबादला हमेशा न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए ही होता है। उन्होंने दोहराया कि न्यायाधीशों के तबादलों और तैनाती संबंधी निर्णय पूरी तरह से न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

जस्टिस भुयान ने न्यायिक नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली का भी बचाव किया और इसके विकास को उस अवधि से जोड़ा जब न्यायिक नियुक्तियों में सरकार के अत्यधिक प्रभाव ने गंभीर चिंताएं पैदा कर दी थीं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक प्रभाव और हस्तक्षेप की अत्यधिक भूमिका को देखते हुए कॉलेजियम प्रणाली समय की आवश्यकता थी।

हालांकि न्यायमूर्ति भुयान ने इस आलोचना को स्वीकार किया कि कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव है, फिर भी उन्होंने कहा कि यह उन विकल्पों की तुलना में बेहतर है जो न्यायिक नियुक्तियों में सरकार की अधिक भूमिका की अनुमति देंगे। उन्होंने आगे कहा कि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कॉलेजियम प्रणाली एकदम सही है। लेकिन फिलहाल, यह उपलब्ध विकल्पों की तुलना में कहीं बेहतर विकल्प है।

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न्यायमूर्ति भुयान ने इस बात पर भी टिप्पणी की कि न्यायपालिका की रक्षा का बाहरी या भौतिक हमलों को रोकने से बहुत कम संबंध है। उन्होंने कहा कि हमें अदालतों की सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ की एक पूरी टुकड़ी की जरूरत नहीं है। कोई भी अदालतों पर शारीरिक हमला नहीं करने वाला है। कई लोगों का कहना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा भीतर से ही है।

उन्होंने चेतावनी दी कि विश्वसनीयता का नुकसान संस्था को खोखला कर देगा, भले ही अदालतें काम करना जारी रखें। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश तो रहेंगे ही। अदालतें भी रहेंगी। लेकिन संस्था का मूल तत्व और आत्मा गायब हो जाएगी। न्यायमूर्ति भुयान ने न्यायिक स्वतंत्रता को संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा से जोड़ा और इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक अदालतें अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मौजूद हैं, भले ही ऐसा करना अलोकप्रिय हो।

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