राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का स्तर लगातार खराब श्रेणी में बना हुआ है। पिछले कई दिनों से लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। बढ़ते प्रदूषण ने न केवल बाहर निकलना मुश्किल कर दिया है, बल्कि इसका असर अब लोगों के स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई देने लगा है- चाहे फेफड़ों की समस्या हो या अन्य बीमारियां।
इस बिगड़ती हवा के बीच तकनीक ने भी काफी प्रगति की है। सोशल मीडिया पर लगातार यह बहस चल रही है कि क्या खराब हवा से बचाने में एयर प्यूरीफायर वास्तव में कारगर हैं? और क्या घर के अंदर रहने वाला व्यक्ति साफ हवा ले सकता है?
इसी सवाल का एक नया जवाब है-वियरेबल एयर प्यूरीफायर। ये छोटे आकार के पोर्टेबल उपकरण होते हैं, जिन्हें आसानी से अपने साथ रखा जा सकता है। मार्केट में फिलहाल दो तरह के वियरेबल एयर प्यूरीफायर उपलब्ध हैं- मास्क-टाइप प्यूरीफायर, और कंपैक्ट डिवाइस, जिन्हें गले में पहन सकते हैं। गले में पहनने वाले प्यूरीफायर बैटरी से चलते हैं और चार्ज्ड आयन छोड़ते हैं। ये आयन फाइन पार्टिकुलेट मैटर से चिपक जाते हैं, जिससे कणों का भार बढ़ जाता है और वे हवा में तैरने के बजाय नीचे बैठ जाते हैं। जानकारों का मानना है कि इससे व्यक्ति के आसपास एक तरह का पर्सनल क्लीन-एयर जोन बन जाता है।
इनकी प्रभावशीलता पूरी तरह उपयोग की गई तकनीक पर निर्भर करती है। जिन प्यूरीफायर में HEPA (High Efficiency Particulate Air) फिल्टर होते हैं, वे प्रदूषक कणों और एलर्जन को प्रभावी ढंग से कम कर सकते हैं। कुछ आंकड़ों के अनुसार ऐसे प्यूरीफायर PM 2.5 जैसे कणों को 40 से 90 प्रतिशत तक घटा सकते हैं।
हालांकि IIT कानपुर की नेशनल एरोसोल फैसिलिटी की एक स्टडी बताती है कि इनडोर वातावरण में वियरेबल प्यूरीफायर की वजह से हवा में मौजूद कण 90 प्रतिशत तक कम हो सकते हैं, वह भी सिर्फ 30 मिनट के भीतर। लेकिन बाहर के खुले माहौल में इनका असर कम हो जाता है, क्योंकि हवा का रुख और गति लगातार बदलती रहती है।
इन उपकरणों को लेकर विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि वियरेबल प्यूरीफायर, N95 मास्क का विकल्प नहीं बन सकते। N95 मास्क जिस स्तर की फिल्ट्रेशन क्षमता रखते हैं, उतना सुरक्षा स्तर यह डिवाइस नहीं दे पाते। इसलिए जहां प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक हो, वहां N95 मास्क को ही प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है। वियरेबल प्यूरीफायर केवल एक अतिरिक्त सपोर्ट हैं, उनकी जगह नहीं।
