Sardar Vallabhbhai Patel Statue, Statue of Unity: स्वतंत्रता सेनानी, लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल का देश को समर्पित आदर्शवादी जीवन इतना महान है कि उसकी विशालता के आगे 182 मीटर ऊंची उनकी प्रतिमा को और विस्तार दिए जा सकता है। निश्चित तौर पर भारत और दुनिया भर में सरदार पटेल के चाहने वाले लोगों के लिए उनका स्मारक उनके आदर्शों को याद दिलाने और उनके पथ पर चलने के लिए हमेशा प्रेरित करता रहेगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस महापुरुष की इतनी विशाल प्रतिमा बनाने वाला शख्स कौन है? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि विश्व की सबसे ऊंची लौह पुरुष की मूर्ति बनाने वाला शख्स महात्मा गांधी का भक्त है और हजारों पत्थरों पर राष्ट्रपिता को तराश चुका है। यही नहीं, उसका खुद का जीवन भी गांधीवादी विचारधारा से जरा भी इतर नहीं रहा है। यहां तक की यह शख्स गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन में भी शामिल रह चुका है। मिलिए राम वनजी सुतार से। राम वनजी सुतार वैसे तो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। मूर्ति शिल्प कला की दुनिया में इनका कोई सानी नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विंध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच नर्मदा नदी के टापू स्थित सरदार पटेल के जिस स्टेच्यू ऑफ यूनिटी का बुधवार (31 अक्टूबर) को उनकी 143वीं जयंती पर अनावरण किया, उसे राम वनजी सुतार ने ही डिजाइन किया है और इस काम में उनके बेटे अनिल राम सुतार ने भी योगदान दिया है। सुतार ने 50 से ज्यादा विशाल स्मारकीय मूर्तियां बनाई हैं। भारत के लिए वह सात दशकों में 8000 से ज्यादा मूर्तियों को आकार दे चुके हैं। इसके लिए उन्हें पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है।
50 के दशक में सुतार के करियर को तब ऊंचाई मिली जब उन्होंने गांधी सागर बांध के लिए चंबल सिंबोलिक मोन्युमेंट बनाया। 45 फुट ऊंची इस कलाकृति को एक ही पत्थर से तैयार किया गया, जिसमें एक मां और उसके दो बच्चे की मूर्ति बनाई गई। उनके काम से खुश होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें भाखरा बांध को तैयार करने वालों को समर्पित 50 फुट ऊंचा कांस्य स्मारक बनाने का काम सौंपा था। 1959 में गणतंत्र दिवस पर मजदूरों को समर्पित इस स्टेच्यू का अनावरण हुआ था।
50 के दशक की शुरुआत में सुतार ने अजंता और एलोरा की गुफाओं की मूर्तियों की मरम्मत करने में दिलचस्पी भाग लिया था। महाराष्ट्र के धूलिया जिले के गोंडुर में 1925 को जन्मे राम वनजी सुतार को उनके गुरु श्रीराम कृष्ण जोशी ने मूर्तिकला के लिए प्रेरित किया था। सुतार कहते हैं कि उन्होंने मूर्तिकार बनने का ही सपना देखा था और उसमें आगे बढ़ते गए। उनके इस पेशे के पीछे एक और दिलचस्प कहानी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुतार बता चुके हैं कि बचपन में उन्हें स्कूल जाना पसंद नहीं था, वह ज्यादातर समय चिड़ियों को दाना खिलाने में बिताते थे। एक रात उनके सपने में एक सुनहरी चिड़िया आई और उनसे उनके प्रिय काम को करने के लिए कहने लगी। अगली सुबह वह अपने गुरु के घर से निकल गए और 6 किलोमीटर पैदल रास्ता तय कर शहर पहुंच गए। बहुत मेहनत करके कुछ पैसा जुटाया और बॉम्बे के जेजे आर्ट स्कूल में दाखिला पाने में सफल हो गए।
सुतार पढ़ाई के बाद वह 1959 में दिल्ली आ गए। कुछ दिन सूचना और प्रसारण में नौकरी की और फिर फ्रीलांस स्कल्पटर बन गए। दिल्ली के लक्ष्मीनगर में स्टूडियो खोला और फिर 1990 में नोएडा शिफ्ट हो गए। 2004 में उन्होंने अपना स्टूडियो बनाया। 2006 में साहिबाबाद में एक कास्टिंग फैक्ट्री बनाई। सरदार पटेल के रूप में विश्व का सबसे ऊंचा स्मारक बनाने के लिए सुतार को हमेशा याद किया जाएगा।
