पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में भारी गिरावट के बावजूद, दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक बना हुआ है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, हापुड़ और नोएडा देश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में सबसे ऊपर रहे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के इन शहरों में दैनिक औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) क्रमशः 437, 420 और 418 रहा जो ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है।
दिल्ली का एक्यूआई भी रविवार को 391 दर्ज किया गया जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में है जबकि एक दिन पहले यह 370 था। वायु गुणवत्ता प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (AQEWS) के अनुसार, आने वाले दिनों में शहर की वायु गुणवत्ता ‘बेहद खराब’ बनी रहने की आशंका है।
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के डीएसएस के लेटेस्ट आंकड़ों से पता चला है कि खेतों में पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है। शनिवार तक परिवहन क्षेत्र से उत्सर्जन लगभग 14% के उच्च स्तर पर बना रहा जबकि राजधानी में PM2.5 के स्तर में खेतों की आग का हिस्सा इस मौसम में सबसे कम 2.6% पर आ गया जो 17 नवंबर को 16% था।
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पराली जलाने की घटनाओं में गिरावट
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के आंकड़ों के अनुसार, रविवार को पराली जलाने की घटनाओं में भारी गिरावट दर्ज की गई, हरियाणा में केवल एक और पंजाब में तीन मामले सामने आए। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में 522, मध्य प्रदेश में 607 और राजस्थान में 21 घटनाएँ सामने आईं। 15 सितंबर से 23 नवंबर के बीच, 6 राज्यों में कुल 27,720 पराली जलाने की घटनाएं सामने आईं। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में इस बीच खेतों में पराली जलाने की घटनाएं क्रमशः 5088, 617, 5622, 5, 2804 और 13584 थीं।
सेंटर फॉर रिसर्च, एनर्जी एंड क्लीन एयर के वायु गुणवत्ता विश्लेषक डॉ मनोज कुमार ने डीएसएस डेटा का हवाला देते हुए कहा, “विशेषज्ञों के अनुसार खेतों में आग लगाने का पीक टाइम भी समाप्त हो गया है। जैसा कि अनुमान लगाया गया था, दिल्ली का AQI 11 से 13 नवंबर, 2025 तक ‘गंभीर’ श्रेणी में था, इस दौरान पराली जलाने की घटनाएं भी अपने पीक पर थीं जो तब से तेजी से गिर गई है। अब हम जो धुंध देख रहे हैं, वह बड़े पैमाने पर साल भर के स्रोतों जैसे वाहन, उद्योग, बिजली संयंत्र, अपशिष्ट जलाना आदि से है।”
दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण स्तर में पराली जलाने का योगदान
डॉ मनोज कुमार ने कहा कि हर साल, दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के स्तर में पराली जलाने का योगदान चरम पर पहुंचने के बाद नवंबर के तीसरे सप्ताह तक कम हो जाता है। उन्होंने आगे कहा, “भले ही आग लगने की घटनाओं में कमी आई हो लेकिन एक-दो दिनों के लिए पराली जलाने की घटनाओं में 22% की वृद्धि हुई जो बहुत ज़्यादा है। स्थानीय और सीमा पार के स्रोतों के कारण दिल्ली की वायु गुणवत्ता भी अत्यधिक प्रदूषित बनी हुई है।”
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