कांग्रेस इस समय अपने अब तक के सबसे गहरे राजनीतिक संकट से जूझ रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में महज 52 सीटों पर जीत हासिल कर सकी। हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। पार्टी फिलहाल पुराने और युवा पीढ़ी के वर्चस्व में फंसी है। कांग्रेस का अध्यक्ष कोई युवा पीढ़ी से हो या उम्रदराज अनुभवी। इस पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है।
बहरहाल यह पहली बार नहीं है कि कांग्रेस इस तरह से संघर्ष कर रही हो। बाल गंगाधर तिलक से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी कई बार ऐसी संघर्ष की स्थिति सामने आ चुकी है। 1907 में गोपाल कृष्ण गोखले और तिलक के बीच संघर्ष देखने को मिला तो तब भी पार्टी में सबकुछ सही नहीं था। कांग्रेस विभाजित होकर गरम दल और नरम दल में बंट गई थी। इसके बाद भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन ने दोनों के बीच संघर्ष पर कहा था कि ‘कांग्रेस अपने पतन की ओर’ है। लेकिन पार्टी ने तब भी खुद को उबारा।
1967 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी में ‘दस सूत्रीय कार्यक्रम’ पेश किया बैंकों पर सरकार का नियंत्रण, पूर्व राजे-महाराजों को मिलने वाले वित्तीय लाभ और न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण इसके मुख्य बिंदु थे। इंदिरा की पेशकश पर कांग्रेस पार्टी ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। इंदिरा गांधी को यह बात नागवार गुजरी। इससे सिंडिकेट और इंदिरा गांधी आर-पार की लडाई के मूड में आ गए थे। लेकिन यह संघर्ष की स्थिति भी ज्यादा दिनों तक नहीं रही। इसके बाद 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद भी पार्टी ने जमकर संघर्ष किया। लेकिन इन सब के बावजूद कांग्रेस ने हमेशा खुद को इन विपरीत परिस्थितियों से निकाला।
हालांकि पहले क्या हुआ था और अब क्या मौजूदा परिस्थितियां है दोनों में बहुत फर्क है। लेकिन एक बात कड़वा सच है कि कांग्रेस केंद्र में मौजूदा समय में जिस विपरीत परिस्थितियों का सामना कर रही है शायद ऐसा पहले कभी नहीं था। केंद्र में कांग्रेस का मुकाबला बीजेपी से है। जिसने नरेंद्र मोदी के सहारे खुद को एक ऐसी पार्टी के रूप में तैयार किया है जो मौजूदा समय में सबसे मजबूत है। मोदी ने खुद को एक मसीहा के रूप में प्रदर्शित किया है जो कि भारत के दुश्मनों से लोहा लेने में पीछे नहीं हटते।
राहुल के इस्तीफे के बाद कांग्रेस को खतरा: राहुल के इस्तीफे के बाद कांग्रेस कर्नाटक में सत्ता के लिए संघर्ष कर रही है। यहां उनके 12 विधायक बागी होकर इस्तीफा दे चुके हैं। गोवा में भी विधायकों ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है। अगर ये कहा जाए कि बिना कांग्रेस अध्यक्ष के पार्टी को नुकसान हो रहा है तो यह कई हद तक सही होगा।
अध्यक्ष कौन बनेगा: राहुल के इस्तीफे के बाद यूपीए चेयरपर्सन और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पार्टी की कमान संभालेगी यह मुश्किल लगता है। पहली वजब उनकी बढ़ती उम्र और फिर उनका स्वास्थ्य भी कुछ ठीक नहीं रहता। अब सवाल उठता है अगर किसी युवा को इस अहम पद पर बैठाया जाए तो वह कौन होगा? जिस नाम के सबसे ज्यादा चर्चे हैं वह है राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट और कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया। ये दोनों ही नेता युवा हैं और पार्टी इनमें से किसी एक के कंधों पर अपनी भविष्य की रणनीति तय कर सकती है।
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंद सिंह भी किसी युवा को इस पद पर नियुक्त कर ने की वकालत कर चुके हैं। लेकिन इसे कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी कहे या फिर ताकत कि इस 134 साल पुरानी को ज्यादातर समय नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य द्वारा ही संचालित किया जाता रहा है। हालांकि कई मौकों पर गैर-कांग्रेसी भी पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त किए गए लेकिन कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार हमेशा से एक सिक्के के दो पहलू की तरह नजर आए हैं।

