सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण को लेकर 7 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट इस बात की समीक्षा कर रहा है कि क्या राज्य कोटा के अंदर कोटा देने के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को उप-वर्गीकृत कर सकते हैं? इसे लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) अपने सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक दर्जे के हिसाब से बराबर नहीं हो सकतीं। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण में समय और जरूरत के हिसाब से बदलाव किया जाना चाहिए।
आरक्षण पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति के अंदर विभिन्न जातियों के लिए सामाजिक स्थिति और अन्य संकेतक भिन्न हो सकते हैं। इसलिए, सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की डिग्री एक व्यक्ति या जाति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न हो सकती है। सुनवाई के दौरान सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात जज की संविधान पीठ ने 23 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि वे (एससी/ एसटी) एक निश्चित उद्देश्य के लिए एक वर्ग हो सकते हैं लेकिन वे सभी उद्देश्यों के लिए एक वर्ग नहीं हो सकते हैं। बता दें कि कोर्ट इस बात की समीक्षा कर रहा है कि क्या राज्य सरकार को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में उप-वर्गीकरण करने का अधिकार है या नहीं।
कोटा के अंदर कोटा पर क्या बोला केंद्र
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संविधान पीठ के समक्ष ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों के संविधान पीठ के 2004 के फैसले के निष्कर्षों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह राज्य को आरक्षण के क्षेत्र को उचित रूप से उप-वर्गीकृत करके उचित नीति तैयार करने से रोकता है। इससेअवसर की समानता की संवैधानिक गारंटी कम होती है। सॉलिसिटर जनरल ने कोटा के भीतर कोटा का समर्थन करते हुए पीठ से यह भी कहा कि केंद्र सरकार सैकड़ों वर्षों से भेदभाव झेल रहे लोगों को समानता दिलाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई के उपाय के रूप में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की घोषित नीति के लिए प्रतिबद्ध है।
यह है मामला?
सुप्रीम कोर्ट में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 2010 के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें उसने पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) को रद्द कर दिया था, जो सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित आरक्षण में 50 फीसदी सीटों पर ‘वाल्मीकि’ और ‘मजहबी सिख’ जातियों को पहली प्राथमिकता प्रदान करती थी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में कुल 23 याचिकाएं दाखिल की गई हैं। संविधान पीठ पूरे मामले की सुनवाई कर रही है।
इनपुट-एजेंसी
