यकीनन इस समय बेरोजगारी देश की प्रमुख आर्थिक-सामाजिक चुनौती है। हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी असंगठित क्षेत्र के उद्यमों से संबंधित आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2015 से जून 2016 की अवधि की तुलना में अक्तूबर 2022 से सितंबर 2023 की अवधि के दौरान विनिर्माण क्षेत्र के 18 लाख असंगठित उद्यम बंद हो गए हैं। इन उद्यमों में करीब 54 लाख लोग नौकरियों में थे। पिछले दस वर्षों में संघ लोक सेवा आयोग, रेलवे भर्ती बोर्ड और कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) ने जो भर्तियां की हैं, वे रिक्त पदों की तुलना में कम बहुत हैं।
एनएसओ द्वारा जारी आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) आंकड़ों के अनुसार भारत के शहरी इलाकों में बेरोजगारी की दर वित्तवर्ष 2023-24 की चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च 2024) में बढ़ कर 6.7 फीसद हो गई है, जो इसके पहले की तिमाही में 6.5 फीसद थी। शहरी बेरोजगारी पिछली चार तिमाही के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। पंद्रह साल से अधिक उम्र में बेरोजगारी की दर जनवरी-मार्च 2023 की तिमाही के 6.8 फीसद के बाद सर्वाधिक है। सर्वेक्षण के अनुसार युवा बेरोजगारी का स्तर बढ़ा है और यह बीती तिमाही के 16.5 फीसद से बढ़कर चौथी तिमाही में 17 फीसद हो गया। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इस आयु वर्ग के लोग पहली बार श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। इससे शहरी रोजगार के बाजार में गिरावट का पता चलता है।
पिछले दिनों फ्रांस के ‘कारपोरेट एंड इन्वेस्टमेंट बैंक नेटिक्सि एसए’ द्वारा प्रकाशित अध्ययन रपट के मुताबिक भारत में जिस तेजी से युवा रोजगार के लिए तैयार होकर श्रमशक्ति (वर्क फोर्स) में शामिल हो रहे हैं, उसे देखते हुए भारत को 2030 तक प्रति वर्ष 1.65 करोड़ नई नौकरियों की जरूरत होगी। इसमें से करीब 1.04 करोड़ नौकरियां संगठित क्षेत्र में पैदा करनी होगी। जबकि पिछले दशक में सालाना कुल 1.24 करोड़ नौकरियां ही पैदा हो सकी थीं। इस रपट में यह भी कहा गया है कि भारत को अपनी अर्थव्यवस्था में तेजी को बरकरार रखने के लिए सेवाओं से लेकर विनिर्माण तक सभी क्षेत्रों को नई रफ्तार से बढ़ावा देना होगा। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार वर्ष 2022 में भारत की कुल बेरोजगार आबादी में से 83 फीसद बेरोजगार युवा थे। विश्व बैंक के मुताबिक, भारत की कुल श्रमशक्ति की भागीदारी दर मात्र 58 फीसद है, जो भारत के एशियाई समकक्ष देशों की तुलना में बहुत कम है।
ऐसे में नई सरकारी नियुक्तियों और नए रोजगार के अवसर सृजित किए जाने की अहम जरूरत है। हाल में बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2024-25 तक पांच लाख 17 हजार सरकारी नियुक्तियां करने का सख्त निर्देश अन्य सभी सरकारों के लिए मिसाल की तरह है। नई केंद्र सरकार द्वारा न केवल सरकारी क्षेत्र में नए रोजगार सृजित करने होंगे, बल्कि देश में असंगठित क्षेत्र लघु एवं मध्यम उद्योगों और ‘गिग वर्कर्स’ की चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा। इन क्षेत्रों में करोड़ों लोगों को रोजगार तो मिल रहा है, लेकिन भविष्य एकदम सुरक्षित नहीं है। जून 2022 में प्रस्तुत नीति आयोग की एक रपट बताती है कि भारत के 77 लाख लोग इस समय ‘गिग इकोनामी’ का हिस्सा हैं।
अनुमान है कि 2029-30 तक इनकी संख्या 2.35 करोड़ हो जाएगी। ‘गिग वर्कर्स’ के लिए बड़ी समस्या नौकरी जाने का खतरा और प्रोविडेंट फंड, हेल्थ इंश्योरेंस और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलना है। देश में रोजगार के मद्देनजर महिलाओं की स्थिति भी अच्छी नहीं है। ‘नैसकाम’ के मुताबिक भारत के प्रौद्योगिकी कार्यबल में केवल 36 फीसद महिलाएं हैं। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और प्रौद्योगिकीविदों में महिलाओं की भागीदारी केवल 14 फीसद है। भारत के बड़े अवसरों के लिए महिलाओं की कम भागीदारी चुनौतीपूर्ण है।
निश्चित रूप से सरकार को तेज रणनीति के साथ इस दिशा में आगे बढ़ना होगा। पिछले दस वर्षों में जिस तरह नई पीढ़ी द्वारा स्वरोजगार के मौके मुट्ठी में लिए गए, उनकी रफ्तार बढ़ानी होगी। हाल ही में शोध संस्थान ‘स्काच’ ने 2014-24 की अवधि में ऋण आधारित हस्तक्षेपों और सरकार आधारित हस्तक्षेपों का अध्ययन किया है। जहां ऋण आधारित हस्तक्षेपों ने प्रतिवर्ष औसतन 3.16 करोड़ रोजगार जोड़े हैं, वहीं सरकार आधारित हस्तक्षेपों से प्रतिवर्ष 1.98 करोड़ रोजगार पैदा हुए हैं। सामान्यतया एक कर्ज पर औसतन 6.6 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा हुए हैं।
इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि सूक्ष्म कर्ज का इस्तेमाल स्थिर और टिकाऊ रोजगार सृजन के लिए किया जा रहा है। इस अध्ययन में रोजगार और स्वरोजगार से संबंधित बारह केंद्रीय योजनाओं को शामिल किया गया है। इनमें मनरेगा, पीएमजीएसवाई, पीएमईजीपी, पीएमए-जी, पीएलआइ, पीएमएवाई-यू, और पीएम स्वनिधि जैसी प्रमुख योजनाएं शामिल हैं। अध्ययन के मुताबिक पिछले दस वर्षों में ऋण अंतराल यानी जीडीपी के अनुपात में कर्ज के अंतर में 12.1 फीसद की गिरावट आई है।
विगत दस वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमता (एआइ) जैसे नए कौशल से नई पीढ़ी के लिए रोजगार के मौके बढ़े हैं। अब सरकार को देश में वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) की स्थापनाओं की रफ्तार बढ़ाकर नए तकनीकी कौशल वाले युवाओं के लिए रोजगार के अधिक मौके सृजित करने की डगर पर आगे बढ़ना होगा। उच्च कौशल, कम लागत, प्रतिभा और मूल्य निर्माण जैसी भारत की विशेषताएं दुनिया में अधिक प्रचारित-प्रसारित कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में और ज्यादा जीसीसी स्थापित करने के लिए प्रेरित करना होगा। ‘नैसकाम-जिनोव’ की ताजा रपट के मुताबिक वर्तमान में भारत तकरीबन 1600 जीसीसी की मेजबानी कर रहा है, जिसमें उच्च कौशल प्रशिक्षित 16.6 लाख लोग कार्यरत हैं।
भारत 2025 तक 1,900 से ज्यादा जीसीसी वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है, जिसमें बीस लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा। चूंकि कई विकसित और विकासशील देशों में तेजी से बूढ़ी होती आबादी के कारण उद्योग-कारोबार और सेवा क्षेत्र के विभिन्न कामों के लिए युवा हाथों की कमी हो गई तथा श्रम लागत बढ़ने से ये देश कार्यबल संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में भारत को इस मौके को भुनाते हुए तेजी से आगे बढ़ना होगा। सरकार ने 2023 तक भारतीय श्रमिक उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न देशों के साथ तेरह समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। ऐसे समझौतों को अब और बढ़ाना होगा। इससे देश की युवा श्रमशक्ति विदेशों में अधिक रोजगार के साथ अधिक विदेशी मुद्रा की कमाई भी कर सकेगी।
अब सरकार को बड़े स्तर पर रोजगार पैदा कर सकने वाली परियोजनाओं के बारे में सोचने की जरूरत है। इस समय रोजगार चुनौतियों के मद्देनजर राष्ट्रीय और स्थानीय दोनों ही स्तरों पर लोक निर्माण कार्यक्रम से रोजगार बढ़ाना जरूरी है। मनरेगा की तरह शहरी बेरोजगारों के लिए भी योजना बनाने की जरूरत है। सरकार को विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़ना होगा। साथ ही अप्रशिक्षित श्रमिकों को नई तकनीकों से प्रशिक्षित करना होगा।
