दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तीन सितंबर तक न्यायिक हिरासत में ही रहने वाले हैं। राउज एवेन्यू कोर्ट ने उनकी हिरासत को आगे बढ़ा दिया है। सीबीआई मामले में मंगलवार को राउज एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई हुई थी, लेकिन राहत ना देते हुए सीएम केजरीवाल को झटका दिया गया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी इसी मामले में सुनवाई को 5 सितंबर तक टाल चुका है। ऐसे में केजरीवाल की मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती दिख रही हैं।

शराब घोटाला: कोर्ट ने क्या बोला?

बड़ी बात यह है कि कोर्ट ने इस मामले की चौथी सप्लीमेंट्री चार्जशीट पर भी कोई फैसला नहीं सुनाया है। यह सीबीआई की वही चार्जशीट है जिसमें केजरीवाल और पांच अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है। अब तीन सितंबर को राउज एवेन्यू कोर्ट इस मामले में फिर सुनवाई करने जा रहा है। इससे पहले भी इसी कोर्ट से सीएम को कई मौकों पर झटका लग चुका है।

क्या मनीष सिसोदिया के पास आ जाएगी ‘आप’ की कमान?

केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से आस

वैसे अरविंद केजरीवाल को अभी सबसे ज्यादा उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से है क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने ही मनीष सिसोदिया को भी इसी मामले में राहत देने का काम किया। यहां तक कहा गया था कि जेल अपवाद है और जमानत अधिकार। अब उसी आधार पर सीएम अरविंद केजरीवाल भी राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। कई मौकों पर उनके वकील, उनकी पार्टी दावा कर चुकी है कि उन्हें फंसाने का काम हो रहा है। जांच एजेंसी को उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है।

अब केजरीवाल जरूर कह रहे हैं कि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है, लेकिन सीबीआई का दावा है कि सीएम और मनीष सिसोदिया ने मिलकर इस शराब घोटाले को अंजाम दिया। यहां तक कहा गया कि जांच एजेंसी के पास केजरीवाल के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।

वो शराब नीति जिसे लेकर हुआ विवाद

जानकारी के लिए बता दें कि तीन साल पहले 17 नवंबर 2021 को राजधानी में आम आदमी पार्टी सरकार ने नई शराब नीति को लागू कर दिया था। इस नई नीति के मुताबिक दिल्ली को कुल 32 जोन में बांटा गया और कहा गया कि दुकानदार हर जोन में 27 शराब की दुकानें खोल सकते हैं। अगर इसी आंकड़े के हिसाब से टोटल किया जाए तो पूरी दिल्ली में 849 शराब की दुकानें खोलने की तैयारी थी। एक बड़ा बदलाव ये होने वाला था कि जो भी शराब की दुकाने खुलनी थीं, वो सारी प्राइवेट सेक्टर की थीं, सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं था। दूसरे शब्दों में जिस शराब करोबार में पहले सरकारी की हिस्सेदारी रहती थी, नई नीति के तहत उसे ही खत्म कर दिया गया।