15 जनवरी को सेना दिवस मनाया जा रहा है। इस अवसर को खास बनाने के लिए राजस्थान के जयपुर में आर्मी परेड आयोजित की गई, इसमें सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी और सीडीएस अनिल चौहान शामिल हुए।

इस दिन यानी 15 जनवरी 1949 को जनरल के.एम. करिअप्पा ने कमांडर-इन-चीफ और सेना प्रमुख का पद संभाला और भारतीय सेना को पहला भारतीय सेना प्रमुख मिला, इसी कारण इस दिन को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

इस अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सेना के प्रथम जनरल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा के बीच हुए पत्राचार से सरकार और सेना के बीच संबंधों की एक दिलचस्प तस्वीरें सामने आती है।

दोनों ने कई बार मांगी एक-दूसरे से माफी

दरअसल करिअप्पा ने कई बार पंडित नेहरू को पत्र लिखकर अपने विचार व्यक्त किए और उनके कुछ विचारों की आलोचना करते रहे, जबकि प्रधानमंत्री नेहरू उन्हें अक्सर नजरंदाज किया। नीतिगत मामलों पर सेना जनरल का बार-बार हस्तक्षेप नेहरू के दृष्टिकोण से अक्सर टकराता रहा, इस कारण दोनों के बीच निजी माफी और कई तीखे पत्रों का आदान-प्रदान हुए।

नेहरू आर्काइव्स में हाल ही में पब्लिश किए दस्तावेजों से पता चलता है कि करिअप्पा के सेना प्रमुख के कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ यह टकराव उनकी सेवानिवृत्ति के बाद भी लंबे समय तक, कम से कम 1962 के भारत-चीन युद्ध तक जारी रहा। दोनों के बीच हुए दर्जनों पत्र-व्यवहार प्रमुख मुद्दों पर उनके परस्पर विरोधी विचारों की कहानी बयां करते हैं।

जनरल करिअप्पा ने की सरकार की प्रशंसा

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जनरल करिअप्पा को सरकार की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करने के लिए फटकार लगाए और कहा कि सैन्य अधिकारियों को सार्वजनिक मंच पर राजनीतिक मुद्दों पर इस तरह की राय नहीं व्यक्त करनी चाहिए।

2 मई 1949 को देहरादून में दिए एक इंटरव्यू में जनरल करिअप्पा ने कहा था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में इतने कम समय में देश ने जो प्रगति हासिल की है वह इतिहास में अभूतपूर्व है। उन्होंने आगे कहा कि लंदन में हाल ही में आयोजित राष्ट्रमंडल सम्मेलन यदि सही परिपेक्ष्य में देखा जाए, तो प्रधानमंत्री के लिए एक बड़ी सफलता साबित हुआ। साथ ही यह भी कहा कि उनके इस प्रगति को जनता ने पर्याप्त रूप से नहीं पहचाना है।

जवाहरलाल नेहरू हो गए नाराज

जवाहरलाल नेहरू सेना प्रमुख के इस प्रशंसा से नाराज हो गए और बिना संकोच उन्होंने जनरल करिअप्पा को अपनी नाराजगी दिखाई। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जनरल करिअप्पा को पत्र लिखकर कहा था, “करीब तीन हफ्ते पहले आपने मीडिया में आपने लंदन में राष्ट्रमंडल सम्मेलन में मेरे द्वारा किए गए कार्यों के लिए मुझे बधाई दी। आपने वर्तमान नेतृत्व में देश द्वारा की गई समग्र प्रगति की ओर भी ध्यान दिलाया। मैं आपके इस कथन के लिए आभारी हूं। हालांकि इससे एक अहम मुद्दा उठता है और मीडिया ने भी इस पर ध्यान दिया है। असली सवाल यह है कि क्या हमारे अधिकारियों को,चाहे वे नागरिक हों या सैन्य अधिकारी, जिनमें सेना प्रमुख भी शामिल हैं, सार्वजनिक रूप से राजनीतिक मामलों पर कोई राय देनी चाहिए?”

जवाहरलाल नेहरू ने कहा, “सवाल यह है कि क्या वरिष्ठ अधिकारियों को सार्वजनिक भाषण देने चाहिए, न केवल अपने काम से सीधे संबंधित विषयों पर बल्कि कुछ सामाजिक या सांस्कृतिक मुद्दों पर भी। आपने जो कुछ भी कहा है वह हानिरहित था, लेकिन राजनीतिक सवालों को छूने में हमेशा खतरा रहता है। यह साफ है कि कसी अधिकारी के लिए सरकार की आलोचना करना, विशेषकर किसी राजनीतिक मुद्दे पर अत्यंत अनुचित होगा और यदि यह सच है तो सरकार की प्रशंसा करने से बचना चाहिए।”

सार्वजनिक बयानों से बचने को कहा

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट किया कि सेना प्रमुख के रूप में जनरल करिअप्पा पूरी सेना के मार्गदर्शक थे और इसलिए उन्होंने ऐसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया। नेहरू ने अपने पत्र में लिखा, “आपने स्वयं कई मौकों पर इस स्थिति को स्पष्ट किया है। मैंने अतीत में कुछ सिख अधिकारियों की सांप्रदायिक राजनीति को स्वीकार नहीं किया था इसलिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि अधिकारी बहुत सीमित मुद्दों को छोड़कर सार्वजनिक भाषणों या बयानों से पूरी तरह बचें।”

आगे उन्होंने कहा, “कभी-कभी अधिकारियों को किसी मुद्दे के सटीक राजनीतिक निहितार्थों का या अनजाने में दिए गए किसी बयान के राजनीतिक निहितार्थों का अंदाजा नहीं होता।”

प्रधानमंत्री नेहरू ने इस बार पर भी जोर दिया कि सरकार को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी और संगठनात्मक शक्ति का समर्थन प्राप्त है, जिससे सेना का राजनीतिक चर्चाओं से पूरी तरह दूर रहना और भी जरूरी हो जाता है। उन्होंने कहा कि अभी अन्य राजनीतिक दल और समूह मौजूद हैं और अगर सेना किसी राजनीतिक दल या विचारधारा की प्रशंसा या आलोचना में कुछ कहते हैं तो वे आपत्ति जता सकते हैं।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आगे कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के प्रसिद्ध ब्रिटिश सैन्य अधिकारी फील्ड मार्शल बर्नार्ड लॉ मोंटगोमरी कभी-कभी सार्वजनिक रूप से नियंत्रण नहीं रख पाते थे। नेहरू ने बताया, “ब्रिटिश सरकार ने उनसे अक्सर ऐसा न करने का अनुरोध किया था मैं हाल ही में स्विट्जरलैंड में था और स्विस संघीय सरकार के कुछ सदस्यों ने मुझे बताया कि मोंटगोमरी की स्विट्जरलैंड में दिए गए एक बेहद साधारण बयान के कारण भारी अपमान सहना पड़ा।”