Delhi Assembly Polls 2020: दिल्ली विधानसभा के चुनाव में यों तो प्रत्येक मतदाता की भूमिका महत्त्वपूर्ण है लेकिन सूबे के त्रिकोणीय सियासी समीकरण को देखते हुए इस दफा यहां के अल्पसंख्यक मतदाताओं के फैसले की अहमियत बढ़ गई है। राजधानी की 70 विधानसभा सीटों में से छह सीटें तो ऐसी हैं जहां हार-जीत का फैसला इन्हीं मतदाताओं के हाथ में है जबकि छह अन्य सीटों के परिणाम को भी ये सीधे प्रभावित करते हैं।
आंकड़ों पर गौर करें तो बल्लीमरान, मटिया महल, ओखला, सीलमपुर, मुस्तफाबाद आदि विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अलग-अलग चुनावों में अल्पसंख्यक प्रत्याशी ही जीत दर्ज करते रहे हैं। इसी तरह चांदनी चौक, सदर बाजार, संगम विहार, तुगलकाबाद, घोंडा, बदरपुर आदि विधानसभा क्षेत्रों में इनके वोट हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं।
दिल्ली में करीब 12-13 फीसद अल्पसंख्यक मतदाता हैं और जाहिर तौर पर कई क्षेत्रों में इनका दबदबा है। इसी दबदबे की वजह से कांग्रेस व आम आदमी पार्टी ने अल्पसंख्यक उम्मीदवार ही उतारे हैं। चाहे सीलमपुर हो, बल्लीमारान हो या मटिया महल हो या फिर ओखला या मुस्तफाबाद विधानसभा की सीटें हों, दोनों दलों की ओर से अल्पसंख्यक प्रत्याशी आमने-सामने हैं।
जानकारों की मानें तो इस बार दिल्ली के अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच मतदान को लेकर दुविधा है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में जारी प्रदर्शन ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है। केंद्र सरकार की ओर से लाए गए इस कानून की पुरजोर मुखालफत कर रहे ये मतदाता भाजपा के पक्ष में शायद ही वोट डालें। ऐसे में उनके सामने कांग्रेस व आम आदमी पार्टी दो विकल्प हैं।

