पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत साल 1976 में की थी। इस दौरान वह महिला कांग्रेस की महासचिव के पद पर कार्यरत थीं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 में वे लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरीं और माकपा के दिग्गज नेता रहे सोमनाथ चटर्जी को हराते हुए अपनी संसदीय पारी शुरू की।
हालांकि बाद में वे कांग्रेस से अलग हो गईं और खुद की पार्टी बना ली। ममता का राजनीतिक करियर काफी दिलचस्प रहा है। उनकी जिंदगी में कई ऐसी घटनाएं घटीं, जिसने उनके राजनीति में डटे रहने के फैसले को और भी ज्यादा मजबूत कर दिया। चाहे ज्योति बसु से दो-दो हाथ करने की बात हो या फिर 1990 में उनपर जानलेवा हमले का मामला हो।
हाजरा मोड़ पर हुआ था जानलेवा हमला: दरअसल, साल 1990 में कांग्रेस ने बंगाल बंद की अपील की थी। इसी दौरान सीपीएम के एक कार्यकर्ता ने ममता पर जानलेवा हमला करवा दिया था। यह घटना हाजरा मोड़ पर हुई थी। ममता के सिर पर लाठी से वार किया गया था, जिसके कारण उनका सिर फट गया था। हालांकि, इसके बावजूद ममता बनर्जी सिर पर पट्टी बंधवाकर दोबारा सड़क पर उतर गई थीं।
बता दें कि तब सिर पर लाठी लगने के बाद ममता बनर्जी की हालत काफी खराब हो गई थी। लोगों ने मान लिया था कि अब उनका बचना बेहद ही मुश्किल है। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना को लेकर उनके करीबी रहे सौगत रॉय ने कहा था कि “हमने तो मान लिया था कि अब ममता का बचना मुश्किल है, लेकिन जीने और बंगाल के लोगों के लिए कुछ बेहतर करने की अदम्य ललक ने ही उनको बचाया था।”
बंगाल की मुख्यमंत्री बनने की खाई थी कसम: यह बात साल 1993 की है। जब ममता बनर्जी एक मूक बधिर बलात्कार पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए राइटर्स बिल्डिंग में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के खिलाफ धरने पर बैठ गई थीं। दरअसल, इस दौरान ममता दीदी ने आरोप लगाया था कि दोषियों को इसलिए गिरफ्तार नहीं किया जा रहा क्योंकि, उनके राजनीतिक संबंध है। 1993 में दीदी केंद्रीय राज्य मंत्री थीं, बावजूद इसके मुख्यमंत्री ज्योति बसु उनसे नहीं मिले।
जिसके बाद ममता बनर्जी उनके चेंबर के दरवाजे के सामने ही धरने पर बैठ गईं। सुरक्षा कर्मियों ने ममता बनर्जी को हटाने की भरपूर कोशिश की। हालांकि, वह नहीं मानी। जिसके बाद कुछ महिला पुलिसकर्मियों ने ममता बनर्जी और बलात्कार पीड़िता युवती को घसीटा। दोनों को सीढ़ियों से घसीटते हुए बाहर ले आए। इस दौरान ममता बनर्जी के कपड़े भी फट गए थे।
इसी दौरान ममता बनर्जी ने कसम खाई थी कि अब वह मुख्यमंत्री बनने पर ही इ, लाल इमारत में कदम रखेंगी। उनकी यह कसम 2011 में 18 साल बाद पूरी हुई थी।

