Romeo-Juliet Clause: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम में एक खास प्रावधान ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़ने पर विचार करे। जिससे करीब-करीब एक ही उम्र के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को अपराध न माना जाए।
यह टिप्पणी जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने की। यह टिप्पणी उस मामले में आई, जहां इलाहाबाद हाई कोर्ट ने POCSO से जुड़े एक जमानत मामले में कुछ निर्देश दिए थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।
रोमियो-जूलियट क्लॉज क्या है?
रोमियो-जूलियट क्लॉज़ का मकसद यह है कि अगर दो नाबालिग लड़का-लड़की लगभग एक ही उम्र के हैं और उनका रिश्ता आपसी सहमति से है, तो उन्हें बाल संरक्षण कानूनों के तहत अपराधी न माना जाए। इस कानून का नाम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक रोमियो और जूलियट से लिया गया है, जो प्रतिद्वंद्वी परिवारों के दो युवा इतालवी प्रेमियों की कहानी है।
यह कानून सबसे पहले अमेरिका में लाया गया था, क्योंकि वहां देखा गया कि आपसी सहमति से रिश्ते में रहने वाले किशोरों को भी ‘बलात्कार’ जैसे अपराधों में फंसा दिया जाता था, जो गलत था। अब भारत में भी सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि ऐसे मासूम किशोरों को POCSO जैसे सख्त कानून से बचाया जाए।
रोमियो-जूलियट क्लॉज से किसे छूट दी गई है?
यदि दो किशोर आपस में संबंध में हैं और उनके बीच उम्र का अंतर एक निश्चित सीमा के भीतर आता है, जो आमतौर पर दो से पांच वर्ष के बीच होता है, तो कानून के तहत उन पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। प्रस्तावित कानून के अनुसार, कम से कम 16 वर्ष की आयु के किशोर और अधिकतम 3 वर्ष के आयु अंतर वाले किशोर के बीच संबंध होने पर आपराधिक आरोप नहीं लगेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन कानूनों का इस्तेमाल केवल बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए ही नहीं किया जा रहा है, बल्कि किशोरों के बीच वास्तविक सहमति से बने संबंधों के मामलों में भी इनका प्रयोग किया जा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि परिवार अक्सर इन संबंधों का विरोध करते हैं और कई मामलों में किशोरों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराते हैं।
संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन
1940 के दशक से, यानी 70 वर्षों से अधिक समय से भारत में लड़कियों के लिए सहमति की कानूनी उम्र 16 वर्ष थी। 2012 में, जब सरकार ने POCSO अधिनियम पारित किया, तो उसने सभी के लिए सहमति की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी। 18 वर्ष की नई उम्र संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (UNCRC, 1990) के अनुरूप है, जो 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बच्चा मानता है।
आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के अनुसार, सहमति की परवाह किए बिना, 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के साथ कोई भी यौन गतिविधि “वैधानिक बलात्कार” मानी जाती है।
बच्चों के खिलाफ आपराधिक मामले
एनजीओ एनफोल्ड इंडिया के अनुसार, असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में POCSO के सभी मामलों में से लगभग 24.3 प्रतिशत किशोरियों के थे जो आपसी सहमति से बने रोमांटिक संबंधों में शामिल थे, और इनमें से 80.2 प्रतिशत मामले लड़कियों के माता-पिता द्वारा उनके साथ रहने का विरोध करते हुए दर्ज किए गए थे। ऐसी परिस्थितियों में, भले ही लड़की ने सहमति दी हो, लड़के पर अक्सर वैधानिक बलात्कार का आरोप लगाया जाता है। लड़की को स्वतः ही “पीड़ित” मान लिया जाता है, जो कानूनी रूप से सहमति देने का अधिकार नहीं रखती।
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