सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ जमानत से जुड़े कुछ आदेशों के आधार पर किसी जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना गलत है, जब तक यह साबित न हो कि उसमें भ्रष्टाचार, पक्षपात या गलत मंशा शामिल थी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर कोई जज जमानत देते समय किसी कानून की धारा का उल्लेख नहीं करता, तो इसे अपने आप में कदाचार नहीं माना जा सकता और इस आधार पर उसे नौकरी से नहीं हटाया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि एक निडर और स्वतंत्र जज ही न्यायपालिका की असली ताकत होता है। जजों को कठिन फैसले लेने पड़ते हैं और कई बार एक पक्ष फैसले से नाराज़ हो जाता है। ऐसे में कुछ लोग बदला लेने की भावना से जजों पर बेबुनियाद आरोप लगा देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्भय सिंह सुलिया की अपील स्वीकार कर ली, जिनकी बर्खास्तगी को पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सही ठहराया था। अब कोर्ट ने उन्हें दोबारा सेवा में बहाल करने, पूरा बकाया वेतन, उस पर 6 प्रतिशत ब्याज और सभी सेवा लाभ देने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट के जज बहुत मुश्किल हालात में काम करते हैं। उन पर काम का भारी दबाव होता है, एक ही दिन में कई मामलों की सुनवाई करनी पड़ती है, फिर भी अधिकांश न्यायिक अधिकारी ईमानदारी से अपना काम करते हैं।

सुलिया ने साल 1987 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा जॉइन की थी और 2003 में उन्हें अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति मिली। उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की शुरुआत 2011-12 में हुई, जब वे खरगोन में तैनात थे। उस समय हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक शिकायत भेजी गई थी। इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मध्य प्रदेश आबकारी (उत्पाद शुल्क) अधिनियम से जुड़े मामलों में जमानत देने के लिए भ्रष्टाचार किया जा रहा है।

शुरुआती जांच के बाद सुलिया पर दो आरोप लगाए गए। पहला आरोप यह था कि उन्होंने चार मामलों में जमानत दी, जिनमें 50 लीटर से ज्यादा शराब जब्त की गई थी। आरोप लगाया गया कि इन मामलों में मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 59-ए का सही तरह से पालन नहीं किया गया। इस धारा के अनुसार, जमानत देने से पहले अदालत को यह संतुष्ट होना होता है कि आरोपी दोषी नहीं है और आगे अपराध करने की संभावना भी नहीं है।

दूसरा आरोप एक गंभीर आपराधिक मामले में दी गई जमानत से जुड़ा था, लेकिन बाद में यह आरोप साबित नहीं हो पाया। जांच अधिकारी ने कहा कि सुलिया ने कुछ मामलों में जमानत दी और कुछ में जमानत खारिज की, जिससे उनके काम में दोहरा रवैया दिखता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने 2014 में उन्हें सेवा से हटा दिया। इसके खिलाफ उन्होंने अपील और रिट याचिका दायर की, लेकिन हाई कोर्ट ने दोनों को खारिज कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जो शिकायत की गई थी, वह असल में अदालत के स्टेनोग्राफर के व्यवहार को लेकर थी और उसमें किसी खास जमानत आदेश का सीधा आरोप नहीं था। कोर्ट ने यह भी देखा कि जांच के दौरान न तो शिकायतकर्ता से और न ही स्टेनोग्राफर से पूछताछ की गई। जांच में जिन सरकारी गवाहों से पूछताछ हुई, उन्होंने आरोपों का समर्थन नहीं किया। जिन मामलों में जमानत दी गई थी, उनमें शामिल लोक अभियोजक ने भी कहा कि आदेश कानून के मुताबिक थे और राज्य सरकार ने उन्हें कभी चुनौती नहीं दी।

शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि किसी आदेश में कानून की धारा का नाम साफ-साफ न लिखना अपने आप में गलत आचरण नहीं माना जा सकता। इसलिए कोर्ट ने माना कि विभागीय जांच के नतीजे गलत और अव्यवहारिक थे, यानी ऐसे निष्कर्ष थे जिन तक कोई भी समझदार व्यक्ति उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर नहीं पहुंच सकता।

नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने सुलिया को फिर से सेवा में बहाल करने और पूरा बकाया वेतन 6 प्रतिशत ब्याज सहित देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि यह रकम आठ हफ्तों के भीतर दी जाए।

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मामले के व्यापक पहलुओं पर बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के जजों की स्थिति और उनकी कमजोरियों पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि जब जजों पर झूठे और लगातार आरोप लगाए जाते हैं, तो वे खुद जवाब नहीं दे पाते। ऐसे मामलों में हाई कोर्ट को, जो उनकी निगरानी करता है, बहुत सावधानी और जिम्मेदारी से काम करना चाहिए।

कोर्ट ने चेतावनी दी कि केवल अंदाजे या शक के आधार पर किसी जज की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। किसी अधिकारी को “संदिग्ध ईमानदारी” वाला ठप्पा लगाने के लिए ठोस और समझदारी भरे कारण होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के नियमों को हर मामले में समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। अंत में कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले को सभी उच्च न्यायालयों तक भेजा जाए।

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