Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारतीय सेना के ईसाई अफसर की बर्खास्तगी को सही ठहराया। अफसर पर आरोप था कि उन्होंने अपनी रेजिमेंट के धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से इनकार कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की बेंच ने पूछा कि क्या इनकार करना उनके अधीनस्थ सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के समान नहीं है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई सूर्य कांत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “वह किस तरह का संदेश दे रहे हैं? एक सैन्य अधिकारी द्वारा घोर अनुशासनहीनता। उन्हें बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए था। इस तरह के झगडालू व्यक्ति सेना में रहने के हकदार हैं।” मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा कि चूंकि रेजिमेंट में सिख सैनिक थे, इसलिए उस जगह एक गुरुद्वारा भी था। उन्होंने कहा, “गुरुद्वारा सबसे धर्मनिरपेक्ष स्थानों में से एक है। जिस तरह से वह व्यवहार कर रहे हैं, क्या वह अन्य धर्मों का अपमान नहीं कर रहे हैं? उनका धार्मिक अहंकार इतना ज्यादा है कि उन्हें दूसरों की परवाह ही नहीं है।”

क्या था मामला?

कमलेसन को मार्च 2017 में भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्हें सिख, जाट और राजपूत कर्मियों की तीन स्क्वाड्रन वाली तीसरी कैवलरी रेजिमेंट में नियुक्त किया गया था। उन्हें सिख कर्मियों वाली स्क्वाड्रन बी का ट्रूप लीडर बनाया गया था। लेकिन उन्होंने गुरुद्वारे में पूजा करने के लिए जाने से अपने सीनियर के आदेश को मना कर दिया था। उसने कहा था कि उसका एकेश्वरवादी ईसाई धर्म इसकी इजाजत नहीं देता। इसके बाद उसे मिलिट्री डिसिप्लिन तोड़ने के लिए निकाल दिया गया था।

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सेना अपने धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण के लिए जानी जाती है- सुप्रीम कोर्ट

मई में उसने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया, लेकिन कोर्ट ने आर्मी के फैसले को सही ठहराया था। अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिए। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने तभी आपत्ति जताई जब उसे पूजा करने के लिए कहा गया। शंकरनारायणन ने कहा, “मुझे किसी देवता की पूजा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संविधान इतनी स्वतंत्रता देता है।” बेंच ने कहा, “आप भले ही 100 चीजों में उत्कृष्ट हों, लेकिन भारतीय सेना अपने धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण के लिए जानी जाती है। जब आप वहां अनुशासन बनाए नहीं रख सकते। तो आप अपने ही सैनिकों की भावनाओं का सम्मान करने में विफल रहे हैं।”

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