दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को करीब 20 साल पुराने मानहानि के मामले में बरी कर दिया है। यह मामला दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने उनके खिलाफ दर्ज कराया था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, साकेत कोर्ट के मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने कहा कि वीके सक्सेना यह साबित नहीं कर पाए कि मेधा पाटकर ने 20 अप्रैल 2006 को इंडिया टीवी के कार्यक्रम ‘ब्रेकिंग न्यूज’ में उनके खिलाफ कोई मानहानिकारक बयान दिया था।

अदालत ने साफ कहा कि शिकायतकर्ता (वीके सक्सेना) अपने आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहे, इसलिए मेधा पाटकर को आईपीसी की धारा 500 (मानहानि) के तहत दोषमुक्त किया जाता है।

यह मामला साल 2006 का है। उस समय वीके सक्सेना राष्ट्रीय नागरिक स्वतंत्रता परिषद (NCCL) के अध्यक्ष थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि टीवी कार्यक्रम के दौरान मेधा पाटकर ने उन पर सरदार सरोवर निगम से ठेके लेने का आरोप लगाया था, जिससे उनकी छवि खराब हुई।

सक्सेना ने यह भी कहा था कि उन्होंने इस बयान के सबूत के तौर पर एक सीडी का जिक्र किया था और बाद में मेधा पाटकर को कानूनी नोटिस भेजकर उस सीडी और आरोपों के सबूत मांगे थे। जब उन्हें कोई जवाब नहीं मिला, तब उन्होंने अदालत में मानहानि का केस दायर किया। लेकिन अदालत ने सबूतों के अभाव में मेधा पाटकर को बरी कर दिया।

यह आपराधिक मानहानि का मामला पहले अहमदाबाद की अदालत में शुरू हुआ था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर साल 2010 में इसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया।

अपने फैसले में न्यायाधीश राघव शर्मा ने कहा कि वीके सक्सेना अदालत में न तो वह मूल वीडियो फुटेज पेश कर पाए, जिसमें मेधा पाटकर के कथित मानहानिकारक बयान थे और न ही उस फुटेज को रिकॉर्ड करने वाला उपकरण। इसी वजह से यह साबित नहीं हो सका कि मेधा पाटकर ने वास्तव में ऐसे बयान दिए थे।

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अदालत ने यह भी कहा कि न तो उस रिपोर्टर को गवाह बनाया गया, जिसने ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड किया था और न ही किसी ऐसे व्यक्ति को जिसने मेधा पाटकर को वह बयान देते हुए देखा हो। कोर्ट के अनुसार, टीवी कार्यक्रम में दिखाया गया क्लिप पूरे इंटरव्यू या प्रेस कॉन्फ्रेंस का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा लगता है।

अदालत ने साफ कहा कि किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए जरूरी है कि पूरा वीडियो और ऑडियो अदालत के सामने रखा जाए या फिर कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाही दे, जिसने वह प्रेस कॉन्फ्रेंस या इंटरव्यू देखा हो। कोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि पूरे फुटेज को देखे बिना यह तय नहीं किया जा सकता कि आरोपी के बयान मानहानिकारक थे या नहीं।

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