दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी महिला को जबरन गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके अपने शरीर पर अधिकार का उल्लंघन है। यह फैसला सान्या भासिन बनाम राज्य व अन्य मामले में दिया गया। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि गर्भावस्था से संबंधित निर्णय और अपने शरीर, प्रजनन क्षमता और मातृत्व संबंधी विकल्पों पर नियंत्रण का अधिकार पूरी तरह से महिला पर ही छोड़ देना चाहिए।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा, “यदि कोई महिला गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती है, तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना महिला की शारीरिक अखंडता का उल्लंघन है और उसके मानसिक आघात को बढ़ाता है जो उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।”

अदालत ने कहा कि समाज की सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह दुनिया अक्सर महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण है। अगर कोई महिला शादीशुदा जीवन में तनाव या विवाद झेल रही हो और उसी समय गर्भवती हो जाए, तो उसका मानसिक दबाव और बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में महिला को अक्सर अपने खर्च खुद उठाने पड़ते हैं। साथ ही, ज्यादातर मामलों में बच्चे की देखभाल और परवरिश की पूरी जिम्मेदारी भी उसी पर आ जाती है, जबकि उसे कहीं से कोई मदद नहीं मिलती। इसका सारा बोझ अकेले महिला को ही सहना पड़ता है।

अदालत ने कहा कि ऐसी अनचाही गर्भावस्था महिला के जीवन में बहुत बड़ी मुश्किलें लेकर आती है और उसे गहरा मानसिक आघात झेलना पड़ता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 312 के तहत गर्भपात कराने के आरोप में एक महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए पीठ ने ये टिप्पणियां कीं। महिला के अलग रह रहे पति ने शिकायत दर्ज कराई थी कि महिला ने उसकी अनुमति के बिना 14 हफ्ते की गर्भावस्था खत्म कर दी। इसी शिकायत के आधार पर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने महिला को अदालत में पेश होने का आदेश दिया था, जिसे बाद में सत्र न्यायालय ने भी सही ठहराया।

लेकिन हाई कोर्ट ने इन दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अगर गर्भपात कानून के तहत और डॉक्टरों की देखरेख में किया गया है, तो उसे अपराध नहीं माना जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत महिला के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

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कोर्ट ने यह तर्क भी खारिज कर दिया कि भ्रूण के अधिकार महिला के अधिकारों से ज्यादा हैं। अदालत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून भी जन्म के बाद ही मानवाधिकारों को मान्यता देता है, गर्भ ठहरने के समय नहीं।

अदालत ने साफ कहा कि गर्भ में पल रहे बच्चे को जीवित महिला के अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने यह भी माना कि गर्भपात मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत कानूनी रूप से किया गया था, इसलिए IPC की धारा 312 के तहत कोई अपराध नहीं बनता। इसी आधार पर पूरा मामला रद्द कर दिया गया।

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