सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक बड़ा और साफ फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि राज्य विधानसभा से पास होकर आने वाले विधेयकों पर राज्यपाल या राष्ट्रपति को मंजूरी देने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं बनाई जा सकती। अदालत ने यह भी साफ किया कि ज्यूडिशियरी खुद से किसी भी विधेयक को “माना हुआ मंजूर” नहीं मान सकती, क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनाया। पीठ ने कहा कि अगर राज्यपाल अनुच्छेद 200 में बताई गई प्रक्रिया को फॉलो किए बिना विधेयकों को लंबे समय तक रोके रखते हैं, तो यह देश के संघीय ढांचे के लिए ठीक नहीं है। इसलिए राज्यपाल के पास किसी भी विधेयक को रोककर रखने की असीमित ताकत नहीं मानी जा सकती।
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पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर भी शामिल थे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी। उसी का जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प होते हैं—वह या तो विधेयक को मंजूरी दें, या फिर उसे दोबारा विचार के लिए विधानसभा को भेजें, या फिर उसे राष्ट्रपति के पास भेज दें।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्यपाल के लिए कोई समयसीमा तय करना संविधान द्वारा दी गई लचीलापन व्यवस्था के खिलाफ है। इसके साथ ही कोर्ट ने तमिलनाडु वाले मामले में आठ अप्रैल को दी गई “मान्य स्वीकृति” को गलत बताया।
अदालत ने कहा कि ऐसा करना मतलब संविधानिक अधिकार किसी और के हाथ में लेना जैसा है, जो ठीक नहीं है। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के अधिकार न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते। (पीटीआई इनपुट के साथ)
