मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट ने महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में वरिष्ठ एनसीपी नेता छगन भुजबल, उनके बेटे पंकज भुजबल और भतीजे समीर भुजबल को बरी कर दिया है। यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पीएमएलए कानून के तहत दर्ज किया था। इस मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश सत्यनारायण नवंदर ने शुक्रवार को तीनों को बरी करने का आदेश दिया।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, भुजबल की ओर से पेश हुए वकील शलभ सक्सेना ने कहा कि ईडी के इस मामले में उनके मुवक्किलों को राहत मिल गई है। उन्होंने बताया कि एसीबी (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) के मामले में पहले ही बरी हो जाने के बाद, ईडी का मामला भी खत्म होना चाहिए। अदालत ने शायद इस तर्क को स्वीकार किया है।
गौरतलब है कि छगन भुजबल, जो इस समय येओला विधानसभा क्षेत्र से विधायक और महाराष्ट्र सरकार में खाद्य मंत्री हैं। उनको मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में 14 मार्च 2016 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर पीएमएलए की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए थे।
उनकी गिरफ्तारी का संबंध महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान दिल्ली में महाराष्ट्र सदन और मुंबई विश्वविद्यालय में कलिना पुस्तकालय के निर्माण के लिए ठेके देने में कथित अनियमितताओं से था। आम आदमी पार्टी द्वारा 2014 में दायर एक जनहित याचिका के परिणामस्वरूप एक विशेष जांच दल (एसआईटी) की स्थापना हुई थी।
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भुजबल के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 471, 120बी (धारा 34 के साथ) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ए), 13(1)(डी), 13(2) के तहत दो एफआईआर दर्ज की गईं थी। साथ ही आईपीसी की धारा 420, 120बी, 109, 465, 468, 471 (धारा 34 के साथ) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(सी), 13(1)(डी) और 13(1) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए भी उन पर आरोप लगाए गए। भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (एसीबी) ने एक आरोपपत्र दाखिल किया जिसमें आरोप लगाया गया कि भुजबल और उनके परिवार ने लगभग 900 करोड़ रुपये का मनी लॉन्ड्रिंग किया। इसी आधार पर उनके खिलाफ पीएमएलए के तहत मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया गया।
सितंबर 2021 में एक विशेष न्यायालय ने महाराष्ट्र सदन घोटाले से संबंधित भ्रष्टाचार मामले में भुजबल, उनके बेटे और अन्य को बरी कर दिया था। इस मामले की जांच एसीबी ने की थी। न्यायालय को भुजबल की संलिप्तता में किसी साजिश या अवैध वित्तीय लेनदेन का कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं मिला। भुजबल ने तर्क दिया कि ठेके देने के फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे और रिश्वतखोरी के आरोप सबूतों से समर्थित नहीं थे।
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