Supreme Court: ‘दो वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्ते को तोड़ना किसी व्यक्ति के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाने के लिए आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।’ सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी सोमवार को औरंगाबाद के एक वकील के खिलाफ दायर बलात्कार के मामले को खारिज करते हुए कही।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि किसी रिश्ते को सिर्फ इसलिए बलात्कार में नहीं बदला जा सकता, क्योंकि वह असहमति या निराशा में समाप्त हुआ। पीठ ने कहा कि शादी का झूठा वादा करके बलात्कार के आरोपों के समर्थन में स्पष्ट साक्ष्य होने चाहिए।
पीठ ने कहा, “केवल सहमति से बने जोड़े के बीच संबंध टूटने से आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं हो सकती… प्रारंभिक चरण में सहमति से बने संबंध को आपराधिकता का रंग नहीं दिया जा सकता, जब उक्त संबंध वैवाहिक संबंध में परिणत नहीं होता। ” इसमें कहा गया है कि विवाह के झूठे वादे के आधार पर बलात्कार के मामले में यह दर्शाया जाना चाहिए कि वादा शुरू से ही धोखापूर्ण था और महिला की सहमति पूरी तरह से उस गलत बयानी से उत्पन्न हुई थी।
पीठ ने कहा, “बलात्कार और सहमति से बनाए गए यौन संबंध में स्पष्ट अंतर है। अदालत को सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए कि क्या आरोपी वास्तव में पीड़िता से शादी करना चाहता था या उसने अपनी हवस मिटाने के लिए झूठा वादा किया था।”
अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वकील पर एक महिला से शादी का झूठा वादा करके बार-बार बलात्कार करने का आरोप लगाते हुए दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने पाया कि दोनों के बीच संबंध स्वैच्छिक थे और तीन साल से ज़्यादा समय तक चले। महिला ने उस दौरान कभी भी ज़बरदस्ती या सहमति के अभाव का आरोप नहीं लगाया।
यह मामला छत्रपति संभाजीनगर में 2024 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता, जो अपने पति से अलग रह रही एक विवाहित महिला है। वो साल 2022 में वकील से मिली थी जब वह उसे भरण-पोषण की कार्यवाही में मदद कर रहा था। समय के साथ, दोनों करीब आ गए और उनके बीच शारीरिक संबंध बन गए।
शिकायत के अनुसार, वकील ने उसे शादी का वादा किया था, लेकिन बाद में मुकर गया। महिला का आरोप है कि वह कई बार गर्भवती हुई और उसकी सहमति से गर्भपात भी कराया। जब उसने अंततः शादी करने से इनकार कर दिया और उसे धमकाया, तो उसने शादी के झूठे वादे के तहत बलात्कार का मामला दर्ज कराया।
वकील ने निचली अदालत से अग्रिम ज़मानत हासिल की और बाद में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत मामला रद्द करने की मांग की। हाई कोर्ट ने यह कहते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी कि आरोपों की सुनवाई ज़रूरी है और महिला के कानूनी सलाहकार के रूप में उसकी भूमिका एक भरोसेमंद रिश्ता बनाती है। इसके बाद उसने शीर्ष अदालत का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने दलील दी कि शिकायत प्रतिशोधात्मक थी और महिला द्वारा कथित तौर पर मांगे गए 1.5 लाख रुपये देने से इनकार करने के बाद ही उन्होंने मामला दर्ज कराया। उन्होंने बताया कि महिला ने अपने तीन साल के रिश्ते के दौरान कभी भी यौन उत्पीड़न की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।
अदालत ने कहा कि आरोपों से पता चलता है कि दोनों के बीच लगातार मुलाक़ातें और सहमति से अंतरंगता बनी हुई थी, न कि ज़बरदस्ती या धोखे से। अदालत को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था या महिला की सहमति का हनन किया गया था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि आपसी स्नेह से उत्पन्न यौन संबंधों को केवल इसलिए अपराध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि विवाह का वादा पूरा नहीं हुआ। अदालत ने कहा, “मौजूदा मामला ऐसा नहीं है जहाँ अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को सिर्फ़ शारीरिक सुख के लिए फुसलाया और फिर गायब हो गया। यह रिश्ता तीन साल तक चला, जो काफ़ी लंबा समय है।”
इस निर्णय में असफल रिश्तों के मामलों में बलात्कार संबंधी प्रावधानों के बढ़ते दुरुपयोग के प्रति चेतावनी दी गई। पीठ ने कहा, “हर खराब रिश्ते को बलात्कार के अपराध में बदलना न केवल अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपी पर अमिट कलंक और गंभीर अन्याय भी थोपता है। आपराधिक न्याय तंत्र का ऐसा दुरुपयोग गंभीर चिंता का विषय है।”
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न्यायालय ने दोहराया कि जब दो वयस्क स्वेच्छा से लंबे समय तक संबंध बनाए रखते हैं, तो सहमति के तत्व को पूर्वव्यापी रूप से वापस नहीं लिया जा सकता। न्यायाधीशों ने पाया कि महिला, जो एक बालिग और शिक्षित व्यक्ति है, उसने अपनी शादी के बावजूद स्वेच्छा से रिश्ता जारी रखा था। अदालत ने ज़ोर देकर कहा कि किसी भी घटना से ज़बरदस्ती, प्रलोभन या शारीरिक धमकी का संकेत नहीं मिलता।
फैसले में कहा गया, “जिन कृत्यों की शिकायत की गई है, वे एक ऐसे रिश्ते के दायरे में हुए जो स्वैच्छिक और स्वेच्छा से हुआ था। ऐसे तथ्यों के आधार पर अभियोजन जारी रखना अदालती तंत्र के दुरुपयोग से कम नहीं होगा।”
