संदीप भूषण
भारतीय फुटबॉल जगत की सबसे बड़ी सुखद घटना के रूप में शुक्रवार से शुरू हो रहे फीफा अंडर-17 विश्व कप के उद्घाटन मुकाबले में भारत की टीम अमेरिका से भिड़ेगी। यह पहला मौका है जब भारत फीफा के किसी भी टूर्नामेंट में भाग ले रहा है। साथ ही करीब 55 साल बाद फुटबॉल जगत में भारत की एक पहचान बनने वाली है। दरअसल पिछले पांच दशक से भारतीय फुटबॉल टीम का ग्राफ लगातार गिर रहा है। छोटे देशों से मैच खेलकर हाल के दिनों में भारत ने रैंकिंग में सुधार तो किया लेकिन किसी भी बड़ी वैश्विक प्रतियोगिता में खिताब तो दूर वह खेल तक नहीं पाया। वह 1950 से 1962 तक का दौर था जब सैय्यद अब्दुल हमीद की अगुआई में भारतीय टीम विश्व की 20 शीर्ष टीमों में गिनी जाती थी। 1951 और 1962 के एशियाई खेलों में टीम ने जीत दर्ज की और 1956 के ओलंपिक में चौथे स्थान के साथ दुनिया को दिखाया कि फुटबॉल में भी हम किसी से पीछे नहीं हैं। दिग्गजों के मुताबिक अब समय है कि फीफा के इस टूर्नामेंट से शुरुआत की जाए और फिर से वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाई जाए।
छह अक्तूबर को दिल्ली में उद्घाटन मैच होना हैं। इस टूर्नामेंट की मेजबानी भारत को सौंपे जाने के साथ ही उसके सामने दो बड़ी जिम्मेदारियां थीं। पहली फीफा के नियमों के मुताबिक सुविधाओं से युक्त स्टेडियम तैयार करना और दूसरी इस टूर्नामेंट के लिए मजबूत टीम बनाना। पहले में कामयाबी की दास्तां तो यहां की स्थानीय आयोजन समिति ने बयां कर दी लेकिन सवाल है क्या दूसरी जिम्मेदारी को हम निभा पाएंगे। मेजबान होने के कारण भारत को फीफा विश्व कप में बगैर मेहनत के प्रवेश मिल गया। इसी के साथ शुरू हुआ खिलाड़ियों के चयन का सिलसिला। समस्या यह थी कि भारत के पास अंडर-17 के लिए कोई आधिकारिक टीम तक नहीं थी। आनन-फानन में 2015 में निकोल एडम को कोच नियुक्त किया गया। इससे पहले 2014 में अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ ने सुब्रत कप और कोकाकोला अंतर राज्यीय टूर्नामेंट के माध्यम से 55 खिलाड़ियों को चुन लिया था। एडम ने इनमें से 20 को चुना और अभ्यास शुरू किया। पहला विदेशी दौरा जर्मर्नी का रहा। 2016 में खिलाड़ियों की संख्या बढ़ाकर 36 की गई। इनमें से कई को एडम ने विदेशी दौरों पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों में से चुना था।
सबकुछ ठीक था। अचानक इस साल एडम को इस्तीफा देने को कहा गया। उन पर आरोप था कि वे खिलाड़ियों को परेशान करते थे। एडम ने दो सालों में भारतीय टीम को नया रूप दिया। उसे संवारा। उसे इस लायक बनाया। अंत में हुआ वही जो हॉकी में होता आया है। एडम को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी जगह लुइस नार्टोस डी माटोस को अंडर-17 टीम का नया कोच बनाया गया। भारत के पास महज सात महीने बचे थे। इसमें उसे एक मजबूत पलटन तैयार करनी थी। माटोस ने मेहनत की लेकिन उन्होंने खुद कहा कि मुझे एक महीना खिलाड़ियों को जानने-समझने में लग गया। इसके बावजूद उनका दावा है कि भारत मजबूती से विदेशी टीमों का सामना करेगा। अब सवाल यही है कि क्या प्रशिक्षक परिवर्तन के सदमे के बाद भी टीम अमेरिका, घाना और कोलंबिया जैसी मजबूत ग्रुप टीमों का सामना करने के लिए तैयार है। पहले मैच में प्रदर्शन के आधार पर ही इसका आकलन किया जा सकता है। फुटबॉल जगत के दिग्गजों का तो यही मानना है टूर्नामेंट खत्म होने बाद ही पता चलेगा कि हम विश्व पटल पर कुछ हासिल कर पाए या सिर्फ मेजबानी तक ही सिमट कर रह गए।

