लेकिन भारत में इंडियन प्रीमियर लीग की सफलता ने क्रिकेट की दुनिया में क्रांति का काम किया है। यही कारण है कि नेपाल और अफगानिस्तान जैसे देश में क्रिकेट मुख्य खेल बन कर उभरे हैं। आयरलैंड, कनाडा और अमेरिका जैसे देश भी इसी राह पर हैं। इन देशों ने क्रिकेट को आगे बढ़ाने के लिए काफी तेजी से काम किया है।
दरअसल, क्रिकेट को एशियाई देशों का खेल माना जाता है। साथ ही यह आरोप लगता है कि यह भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, वेस्ट इंडीज, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, जिंबाब्वे जैसे कुछ देशों तक ही सीमित है। इस खेल को फुटबॉल जैसी विश्व प्रसिद्धि कभी हासिल नहीं हो सकती। लेकिन अब समय बदल रहा है।
जर्मनी जैसे देश जिसे एशिया में उसके फुटबॉल के लिए जाना जाता है, वह दुनिया में क्रिकेट को सबसे तेजी से बढ़ावा देने वाले मुल्क में शामिल है। नीदरलैंड को छोड़ दें तो यूरोपीय महाद्वीप के देशों में यहां सबसे ज्यादा क्रिकेट खिलाड़ी हैं। यह आंकड़ा अपने आप में अचंभित करने वाला है। जर्मनी ने हालांकि काफी पहले ही क्रिकेट को अपने यहां जगह दी थी।
1991 में मान्यता मिलने के बाद आठ साल बाद उसे एसोसिएट का दर्जा मिला। हाल के दिनों में जर्मन क्रिकेट ने काफी प्रगति की है। यहां करीब 400 क्रिकेट क्लब मौजूदा दौर में क्रिकेटरों को तैयार करने और उनकी प्रतिभा को निखारने में लगे हैं।
दूसरी तरफ अमेरिका भी भारत की राह पर तेजी से बढ़ रहा है। यहां क्रिकेट को मुख्य खेल बनाने के लिए बड़े स्तर पर काम किए जा रहे हैं। आधारभूत ढांचा के विकास के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। अमेरिका में क्रिकेट के बढ़ते दायरे को देखते हुए ही शाहरूख खान ने आइपीएल की तरह एक टीम का मालिकाना हक हासिल किया है।
क्रिकेट को पहचान देने और युवाओं को इस खेल के प्रति जागरूक करने के लिए यहां लीग भी आयोजित करने की तैयारी है। लीग में खेलने वाली टीमों पर माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला और एडोब के सीईओ सांतनु नारायण जैसे दिग्गजों ने पैसे लगाए हैं। एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका के क्रिकेट बाजार में करीब एक अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है। यह आंकड़ा अमेरिका में क्रिकेट के बढ़ते दायरे को बताने के लिए काफी है।
अमेरिका ने अपनी महिला क्रिकेट टीम भी बनाई है। अप्रैल 2018 में उसे अंतरराष्ट्रीय टी-20 टीम का दर्जा भी मिल चुका है। उसने अब तक सिर्फ एक मैच जीते हैं जबकि पांच मैच हारे हैं। टीम में ज्यादातर भारतीय मूल की खिलाड़ी हैं। अमेरिका में क्रिकेट को बढ़ाने की जिम्मेदारी भी ज्यादातर भारतीय कंधों पर ही है।
महिला टीम की कोच जूलिया प्राइस हैं जिन्होंने आस्ट्रेलिया की ओर से 10 टैस्ट और 84 एकदिवसीय मैच खेले हैं। वहीं पुरुष टीम के कोच कर्नाटक के पूर्व क्रिकेटर जे अरुणकुमार हैं। भारत के पूर्व विकेटकीपर और मुंबई इंडियंस के क्रिकेट कंसल्टेंट किरण मोरे को सीनियर क्रिकेट आपरेशंस के कंसल्टेंट की भूमिका मिली है। प्रवीण आमरे बल्लेबाजी सलाहकार और सुनील जोशी स्पिन गेंदबाजी सलाहकार के रूप में अमेरिकी टीम को निखारेंगे।
चीन भी जल्द ही क्रिकेट खेलने वाले देशों की कतार में शामिल होने की कवायद में लगा है। 2017 में एसोसिएट सदस्य का दर्जा मिलने के बाद यहां क्रिकेट तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। चीन में क्रिकेट को लाने का मुख्य कारण उसकी वैश्विक ताकत है।
आइसीसी को मालूम है कि यह देश अगर क्रिकेट को अपनाता है तो उसे एक बेहतर और मजबूत निवेशक मिलेगा। साथ ही चीन ने एक दशक में खेल पर जितनाा निवेश किया है वह पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है। इस देश की खासियत है कि उसने जिस खेल को अपने यहां बढ़ना चाहा, उसके लिए किसी भी हाल में खिलाड़ी तैयार किए।
ओलंपिक में शामिल होना भी लक्ष्य
क्रिकेट को अमेरिका और चीन जैसे संपन्न देशों में पहुंचाने का आइसीसी का मुख्य लक्ष्य ओलंपिक में इस खेल को शामिल कराना है। बताते चलें कि क्रिकेट 1900 ओलंपिक का हिस्सा था। तब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच मुकाबला खेला गया था जिसमें ब्रिटेन ने जीत हासिल की थी। एक बार फिर इसे ओलंपिक का हिस्सा बनाने की मुहिम तेजी से जारी है।
हालांकि इस मुहिम को धक्का देने में भारतीय क्रिकेट बोर्ड और इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इन दोनों ने क्रिकेट को ओलंपिक का हिस्सा बनाने का विरोध किया है। यही कारण है कि आइसीसी अमेरिका और चीन जैसे संपन्न देशों को इस खेल का हिस्सा बनाना चाहती है ताकि क्रिकेट में निवेश बढ़े और भारत व इंग्लैंड का दबदबा कम हो।

