India-EU Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच अभी तक ट्रेड डील किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। इस मुक्त व्यापार समझौते (FTA) में कृषि एक बड़ा रोड़ा बनी हुई है। यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र उस “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी सबसे बड़े समझौते से भी बाहर रहने की उम्मीद है, जिसे भारत इस सप्ताह यूरोपीय संघ (EU) के साथ अंतिम रूप देने जा रहा है।
भारत के किसी भी ऐसे FTA में आयात शुल्क में कटौती और गैर-शुल्क बाधाओं को हटाकर बाज़ार खोलता है। भारत के कृषि क्षेत्र को बाहर रखने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। इन्हें समझना बेहद आवश्यक है।
आजीविका है सबसे बड़ा कारण
अमेरिका में 2024 के नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 18.8 लाख फार्म हैं जबकि EU में 2020 में यह संख्या 90.7 लाख थी। इसके विपरीत भारत की 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार देश में कुल परिचालित कृषि जोतों की संख्या 14.64 करोड़ थी।
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केवल प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan) योजना के तहत अप्रैल-जुलाई 2025 की किस्त में लाभ पाने वाले भूमि-धारक किसान परिवारों की संख्या ही 9.71 करोड़ थी। इतनी बड़ी आबादी की आजीविका खेती पर निर्भर होने के कारण भारत की सभी सरकारें विदेशी कृषि उत्पादों को अधिक बाज़ार पहुंच देने को लेकर सतर्क रही हैं।
EU का क्या रहा है रुख
उल्लेखनीय है कि EU ने भी 17 जनवरी को अर्जेंटीना, ब्राज़ील, पैराग्वे और उरुग्वे जैसे चार मर्कोसुर देशों के साथ एक अंतरिम व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे यूरोपीय संसद में झटका लगा। 21 जनवरी को 27 देशों के इस समूह के सांसदों ने 334 के मुकाबले 324 मतों से इस समझौते को यूरोपीय न्यायालय को भेजने के पक्ष में मतदान किया। यह फैसला विशेष रूप से फ्रांस में किसानों के विरोध प्रदर्शनों के बाद आया, जहाँ किसानों का कहना था कि इस FTA से दक्षिण अमेरिकी देशों से बीफ, चीनी और पोल्ट्री उत्पादों का आयात बढ़ जाएगा।
दूसरा और बड़ा कारण है कृषि सब्सिडी
कृषि को अलग रखने का दूसरा बड़ा कारण किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी से जुड़ा है। हमारी इस तालिका में PSE आप देख सकते हैं। यह किसी देश के किसानों को करदाताओं और उपभोक्ताओं से मिलने वाले वार्षिक सकल हस्तांतरण का मौद्रिक मूल्य होता है। 2024 तक के तीन वर्षों में EU का औसत PSE 97.3 अरब डॉलर रहा, जो उसके कुल कृषि प्राप्तियों (gross farm receipts) का 16.4% था।
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सकल कृषि प्राप्तियां खेत स्तर पर कृषि उत्पादन के कुल मूल्य को दर्शाती हैं, जिसमें बाज़ार से मिलने वाली आय और बजटीय सहायता दोनों शामिल होती हैं। PSE में सरकार द्वारा किसानों को दिए जाने वाले प्रत्यक्ष भुगतान इनपुट सब्सिडी और वस्तु-आधारित मूल्य समर्थन शामिल होते हैं। मूल्य समर्थन उन नीतियों से उत्पन्न होता है, जिनके कारण घरेलू कीमतें अंतरराष्ट्रीय (सीमा/बॉर्डर) कीमतों से अधिक हो जाती हैं।
OECD के अनुसार 2022-24 के दौरान EU देशों ने अपने किसानों को औसतन हर साल 58.6 अरब डॉलर की सहायता प्रत्यक्ष व अन्य भुगतानों के रूप में दी। इसके अलावा 16.2 अरब डॉलर की सब्सिडी कृषि इनपुट्स पर दी गई। शेष 22.5 अरब डॉलर की सहायता उन नीतियों से आई, जिनसे EU में कृषि उत्पादों की घरेलू कीमतें आयात कीमतों से अधिक बनी रहीं। इसका अर्थ यह था कि EU के उपभोक्ताओं ने किसानों के लाभ के लिए अधिक कीमत चुकाई।
अमेरिका और भारत की क्या है स्थिति
अमेरिकी किसानों के लिए औसत वार्षिक PSE 38.2 अरब डॉलर रहा, जो उनकी सकल कृषि प्राप्तियों का 7.1% था। इसमें 22 अरब डॉलर के प्रत्यक्ष भुगतान, 13.4 अरब डॉलर की इनपुट सब्सिडी और 2.7 अरब डॉलर का मूल्य समर्थन शामिल था।
भारत की बात इससे काफी अलग है। 2022-24 के दौरान भारत में कृषि इनपुट्स, जैसे उर्वरक, बिजली, सिंचाई जल, ऋण और कृषि मशीनरी, पर दी गई सब्सिडी औसतन 47.9 अरब डॉलर रही। यह OECD द्वारा निगरानी किए गए 54 देशों में सबसे अधिक थी। हालाँकि, PM-Kisan जैसी योजनाओं के तहत प्रत्यक्ष आय सहायता केवल 7.9 अरब डॉलर रही, जो EU (58.6 अरब डॉलर) और US (22 अरब डॉलर) की तुलना में बहुत कम है।
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भारत में क्यों मिलती है किसानों को कम कीमतें
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि भारत में कृषि उत्पादों पर मूल्य समर्थन नकारात्मक रहा। 2022-24 में इसका औसत वार्षिक मूल्य माइनस 129 अरब डॉलर आंका गया। घरेलू भंडारण, आवाजाही और विपणन प्रतिबंधों तथा समय-समय पर लगाए जाने वाले निर्यात प्रतिबंधों के कारण भारत में किसानों को मिलने वाली कीमतें अंतरराष्ट्रीय (निर्यात-समतुल्य) कीमतों से कम बनी रहती हैं।
129 अरब डॉलर का यह नकारात्मक मूल्य समर्थन, इनपुट सब्सिडी (47.9 अरब डॉलर) और प्रत्यक्ष भुगतान (7.9 अरब डॉलर) से कहीं अधिक है। परिणामस्वरूप भारत का कुल कृषि PSE माइनस 73.1 अरब डॉलर रहा, जो सकल कृषि प्राप्तियों का माइनस 14.5% है। यह 2022-24 में सभी देशों में सबसे नकारात्मक था।
हालांकि GDP के प्रतिशत के रूप में भारत का कृषि बजटीय समर्थन (2.9%) EU (0.5%) और US (0.4%) से अधिक था, लेकिन दबाई गई कीमतों के कारण किसानों पर पड़ने वाला परोक्ष कर इससे भी अधिक आँका गया। इसके विपरीत, चीन अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है। 2022-24 में उसका PSE 270.5 अरब डॉलर (सकल प्राप्तियों का 13.3%) रहा, जो किसी भी देश से अधिक है। इसमें 202.1 अरब डॉलर का मूल्य समर्थन, 17.9 अरब डॉलर की इनपुट सब्सिडी और 50.6 अरब डॉलर के प्रत्यक्ष भुगतान शामिल थे। चीन, भारत के विपरीत, अपने किसानों पर शुद्ध कर नहीं लगाता।
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EU के साथ भारत की कृषि रणनीति
भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) के विशिष्ट प्रोफेसर अशोक गुलाटी के अनुसार, EU से कृषि आयात का खतरा अमेरिका की तुलना में कम है। अमेरिका के साथ FTA होने पर भारत में मक्का, सोयाबीन, एथेनॉल और कपास जैसे उत्पादों का भारी आयात हो सकता है। इसके विपरीत EU अधिकांश कृषि उत्पादों में लागत के लिहाज़ से प्रतिस्पर्धी नहीं है, सिवाय शायद चीज़ के। उन्होंने कहा कि उसमें भी वे नीदरलैंड्स की गौडा जैसी प्रीमियम चीज़ ही निर्यात करना चाहेंगे। इसके अलावा वाइन, स्पिरिट्स या ऑलिव ऑयल जैसे उत्पाद आ सकते हैं, जिनसे भारतीय किसानों को कोई खास नुकसान नहीं होगा। अगर EU के साथ FTA में कृषि शामिल होती है, तो यह भारत के लिए उन उत्पादों में लाभकारी हो सकता है, जिनमें उसकी निर्यात क्षमता मजबूत है, जैसे समुद्री खाद्य पदार्थ, फल-सब्ज़ियाँ, पेय पदार्थ, मसाले और चावल।
2024-25 (अप्रैल-मार्च) में भारत ने EU को 518.16 मिलियन डॉलर के झींगे और प्रॉन, 361.79 मिलियन डॉलर के कटलफिश और स्क्विड, 775 मिलियन डॉलर की कॉफी, 93.57 मिलियन डॉलर की चाय, 175.5 मिलियन डॉलर के अंगूर, 279.34 मिलियन डॉलर का चावल, 77.66 मिलियन डॉलर के तिल, 75.33 मिलियन डॉलर का सूखा प्याज़, 57.86 मिलियन डॉलर के खीरे और घेरकिन, 59.47 मिलियन डॉलर का जीरा और 36.82 मिलियन डॉलर की हल्दी का निर्यात किया।
सरल शब्दों में कहें तो भारतीय किसानों को EU के साथ समझौते से अमेरिका की तुलना में कम डर है। गुलाटी के अनुसार कि ज़रूरत पड़ने पर हम 15% का स्टरलाइज़ेशन ड्यूटी लगाकर EU द्वारा दी जा रही सब्सिडी को निष्प्रभावी कर सकते हैं। यह आयात से पर्याप्त सुरक्षा देगा।
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