इंदौर की त्रासदी देश में स्वच्छ पेयजल की स्थिति को लेकर आंखें खोलने वाली है। इसका दुखद पहलू यह है कि मध्य प्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी कहलाने वाला यह शहर सात साल से स्वच्छता का परचम लहरा रहा था। दिसंबर के आखिर में दूषित जल से हुई मौत ने उस परचम को तार-तार कर दिया, जिसमें चमचमाती साफ-सुथरी सड़कें और गंदगी मुक्त मोहल्ले पूरी दुनिया से एक कड़वा सच छिपा रहे थे कि ढंकी-छिपी नालियों में बहते दूषित जल के समांतर पेयजल आपूर्ति करने वाले पाइप जंग लगने से सड़ चुके हैं।

कई महीनों से की जा रही शिकायतों पर तवज्जो नहीं दी गई और पेयजल में घुल गए गंदे पानी ने भागीरथपुरा में कहर बरपा दिया। इंदौर की डरावनी लापरवाही यह बताने के लिए काफी है कि ऊंची अट्टालिकाओं और ऊपरिगामी पुलों से केंद्रित शहरी विकास में गंदगी से बजबजाती नालियों का पानी पेयजल में मिलकर देश के कई शहरों, जिनमें कई राज्यों की राजधानियां भी शामिल हैं, के लोगों को कई वर्षों से बीमार बना रहा है। आंकड़ों के अनुसार 12 महीनों में भारत भर में दूषित जल की आपूर्ति के कारण 5,500 से अधिक लोग बीमार पड़े और 34 लोगों की मौत हो गई।

साल 2023 तक लगातार सात वर्षों तक भारत के स्वच्छता सूचकांक में शीर्ष पर रहने के कारण इंदौर दुनिया भर में चर्चा में रहा। साल 2021 के स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कारों में मध्य प्रदेश की इस तेजी से विकसित हो रही वाणिज्यिक राजधानी को प्रभावी अपशिष्ट जल प्रबंधन के लिए देश का पहला ‘वाटर प्लस’ शहर घोषित किया गया था।

देश भर में 4,000 नगरपालिकाओं को वार्षिक स्वच्छता सूचकांक में शीर्ष स्थान हासिल करने का मौका देने के लिए शहरी मामलों के मंत्रालय ने वर्ष 2024 में सुपर स्वच्छ लीग नामक एक अलग श्रेणी की घोषणा की। जब इंदौर साल 2024-2025 में सुपर लीग में सर्वश्रेष्ठ शहरों में से एक के रूप में उभरा तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। अचानक, नए साल के शुरू होने से कुछ दिन पहले, इंदौर के देश में सबसे ‘स्वच्छ’ होने के तमगे पर सवाल उठने लगे।

24 दिसंबर 2025 से इस साल छह जनवरी के बीच, इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई। इलाके में एक पुलिस चौकी के पास एक पुरानी पाइपलाइन के ऊपर बने एक सार्वजनिक शौचालय को, जिसमें अनिवार्य सेप्टिक टैंक नहीं था, शहर के पेयजल नेटवर्क के दूषित होने का शुरुआती कारण माना गया था। हालांकि, शौचालय को बाद में ध्वस्त कर दिया गया, लेकिन अधिकारी इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या बोरवेल कनेक्शन के माध्यम से भी पानी गंदा हुआ था?

मध्य प्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय के समक्ष आठ मौतों की पुष्टि की। स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, 24 दिसंबर, 2025 से अब तक 310 मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। इनमें से 203 मरीज अभी भी अस्पताल में हैं। इनमें से 25 गहन चिकित्सा इकाई में हैं। इंदौर में दूषित पानी पीने से परिवार के सदस्यों की मौत के मामले में 18 परिवारों को मुआवजा दिया जा चुका है, जबकि मध्य प्रदेश सरकार का कहना है कि आधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या आठ है।

भागीरथपुरा में 24 दिसंबर से छह जनवरी के बीच गंभीर उल्टी और दस्त के बाद कई लोगों की मौत हो गई। मुख्यमंत्री मोहन यादव का कहना है कि ध्यान इस बात पर नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों की मौत हुई है, क्योंकि एक भी जान का जाना दर्दनाक होता है, इसलिए हम आंकड़ों में नहीं उलझते। मुख्यमंत्री ने कहा, प्रशासन का अपनी प्रक्रियाओं का पालन करना एक अलग बात है। सामान्यत:, केवल उन्हीं मामलों को वैध आंकड़े माना जाता है, जिनमें पोस्टमार्टम किया गया हो।

जैसे ही अधिकारियों ने घनी आबादी वाले भागीरथपुरा में घर-घर जाकर जांच करने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को भेजा, संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की और संक्रमण को रोकने का प्रयास किया, एक अलग ही कहानी सामने आई। वास्तव में पुरानी पाइपलाइन नाकाम पाई गईं। दस्तावेजों में संरचनात्मक कमियों का चिट्ठा और नगरपालिका प्रणाली की बेपरवाही का पता लगना, जो स्पष्ट चेतावनियों के बावजूद बार-बार कार्रवाई करने में विफल रही।

इस साल दो जनवरी को 2014 बैच के आइएएस अधिकारी दिलीप कुमार यादव को इंदौर नगर निगम (आइएमसी) के आयुक्त पद से मुक्त कर दिया गया। यादव ने सितंबर 2025 में ही पदभार संभाला था। उनके स्थान पर एक दिन बाद क्षितिज सिंघल को शहर के सबसे बड़े नागरिक संकटों में से एक के बीच जिम्मेदारी दी गई। इंदौर के लिए यह संकट अभूतपूर्व है। अधिकारियों के अनुसार, साल 1920 से पहले, इंदौर सदियों से शहरों द्वारा अपना जल स्रोत रहे तरीके से ही जल प्राप्त करता था। तालाबों और नदियों के पास स्थित कुओं और निकटवर्ती बिलावली झील से। वर्ष 1939 तक, इंदौर के आज के स्वरूप में आने से पहले यशवंत सागर मीठे पानी का जलाशय इसका प्राथमिक जल स्रोत था। यह व्यवस्था लगभग चार दशकों तक पर्याप्त रही।

शहर की जनसंख्या संबंधी समस्याओं के समाधान की नींव तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अप्रैल 1961 में नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध के उद्घाटन के साथ रखी थी, लेकिन परियोजना का पहला चरण साल 1978 में कार्यान्वित हो पाया। पहले चरण के तहत इंदौर के वितरण नेटवर्क में 85 मिलियन लीटर (एमएलडी) पानी पहुंचाया गया। साल 1991-92 में शुरू हुए दूसरे चरण में 95 मिलियन लीटर (एमएलडी) पानी की अतिरिक्त आपूर्ति की गई। हालांकि, उन वर्षों में बिछाई गई पाइपलाइन, जिनमें से कई भागीरथपुरा जैसी शहरी झुग्गी बस्तियों में थीं, बढ़ती हुई आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लायक नहीं बनाई गई थीं।

वर्ष 2008 में, एशियाई विकास बैंक द्वारा वित्तपोषित उदय परियोजना के तीसरे चरण के तहत, नर्मदा से 360 एमएलडी पानी इंदौर में पहुंचाया गया। यह अब तक का सबसे बड़ा अवसंरचना विस्तार था। इसने शहर को दो भागों में बांट दिया- एक तरफ आधुनिक मुख्य पाइपलाइनें थीं, जो निरंतर दबाव बनाए रखने में सक्षम थीं, और दूसरी तरफ पुरानी पाइपलाइनें थीं जो घंटों तक रुक-रुक कर पानी पहुंचाती थीं। उनकी धातुएं कमजोर हो चुकी थीं, जोड़ जंग खा चुके थे और निरंतर प्रवाह को सहन करने की उनकी क्षमता समाप्त हो चुकी थी।

वास्तव में ये पुरानी पाइपलाइन प्रणालियां आज के दबाव, जनसंख्या भार या निरंतर आपूर्ति के लिए कभी भी तैयार नहीं की गई थीं। नए इलाकों में उच्च घनत्व वाले पालीइथिलीन (एचडीपीई) से बने पाइप हैं। ये रासायनिक रूप से प्रतिरोधी हैं और एक सदी तक चलने के लिए बनाए गए हैं। पुराने इलाकों में, पानी एस्बेस्टस-सीमेंट के पाइपों से बहता है, जो सही सलामत होने पर सुरक्षित होते हैं, लेकिन क्षतिग्रस्त होने पर खतरनाक रेशे छोड़ते हैं।

इंदौर की जनसंख्या 30 लाख से अधिक है। अनुमान है कि साल 2040 तक यह 58.70 लाख तक पहुंच जाएगी। इसके लिए लगभग 1,100 एमएलडी उपचारित जल की आवश्यकता होगी।

शहर के पर्यावरण विभाग के अनुसार, जिले को पांच नदियों, 60 झीलों और तालाबों से जल की आपूर्ति होती है। सतही जल स्रोतों – नर्मदा, यशवंत सागर और बिलावली की कुल स्थापित क्षमता 594 एमएलडी है। इस कमी को पूरा करने के लिए शहर 4,945 ट्यूबवेल और 1,004 हैंडपंपों पर निर्भर है। जिला पर्यावरण योजना के अनुसार, पूरे जिले में 1,51,939 बोरवेल हैं। इनमें से कई अनियमित हैं और कई दूषित जलभंडारों से पानी निकालते हैं।

हकीकत यह है कि पुरानी और जर्जर पाइपलाइनों से रिसाव के कारण पानी की बर्बादी के दर्ज मामले भी बहुत ज्यादा हैं। साथ ही जमीनी स्तर पर अपर्याप्त प्रवर्तन के कारण पूरे नेटवर्क में अवैध कनेक्शन की बाढ़ आ गई है। शहर में जल अवसंरचना के असमान वितरण के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति के लिए कई प्रत्यक्ष पाइप लगाए गए हैं। इससे एक ऐसी प्रणाली बन गई है, जहां दबाव असमान है और रिसाव एक आम समस्या है।

इंदौर के सबसे पुराने और सबसे घनी आबादी वाले आवासीय इलाकों में से एक भागीरथपुरा, इंदौर की शान-शौकत से बिलकुल अलग है। यहां की सड़कें अचानक संकरी होकर मुश्किल से दस-12 फुट चौड़ी गलियों में बदल जाती हैं। पीने के पानी और सीवेज की पाइपलाइनें यहां खतरनाक रूप से एक-दूसरे के बेहद करीब से गुजरती हैं। भागीरथपुरा में ज्यादातर पाइपलाइनें साल 1993-94 में झुग्गी-झोपड़ियों में जल नेटवर्क के विस्तार के लिए विदेशी सहायता प्राप्त परियोजना के तहत बिछाई गई थीं। भागीरथपुरा में बोरवेल पर निर्भरता वर्ष 1997 तक जारी रही। साल 2000 के दशक के आरंभ में, नर्मदा से पानी की आपूर्ति लाइनें बिछाई गईं। तब नर्मदा का पानी उपलब्ध कराने में देरी के कारण निवासी बोरवेल पर निर्भर रहे।

बाद में, लोगों ने बोरवेल को नर्मदा जल लाइन से जोड़ दिया। भागीरथपुरा में मौजूदा जल वितरण नेटवर्क को अव्यवस्थित तरीके से बिछाया गया है।

जल विभाग के अधिकारियों ने बताया कि भागीरथपुरा में रिसाव का समय पर पता नहीं चल पाया, क्योंकि इस क्षेत्र में प्रतिदिन केवल एक घंटे के लिए ही पाइपलाइन से पानी आता है। ये पाइपलाइनें निरंतर आपूर्ति नहीं कर सकतीं, जिससे दबाव में गिरावट की निगरानी करना लगभग असंभव हो जाता है। यही संदूषण का सबसे पहला संकेत होता है। पाइपलाइन में पानी का दबाव कम हो गया था। भागीरथपुरा के मामले में भी यही स्थिति है। स्थानीय कर्मचारियों को तुरंत ही कुछ गड़बड़ का पता चल जाना चाहिए था, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं की गई।

भागीरथपुरा में महीनों से खतरे की घंटी बज रही थी। इंदौर महापौर की हेल्पलाइन पर बदबूदार पानी की शिकायत करने के बावजूद पाइपलाइन ठीक करने कोई नहीं आया। पानी की खराब गुणवत्ता को लेकर शिकायतें मौजूदा घटना से पहले से ही मौजूद हैं। साल 2025 में, निगम को पानी की गुणवत्ता से संबंधित 266 शिकायतें मिलींं। इनमें से 23 औपचारिक शिकायतें जोन चार से थीं, जिसमें भागीरथपुरा भी शामिल है। प्रशासन ने साल 2022 में इस क्षेत्र में 9.8 किलोमीटर पुरानी पाइपलाइनों के नवीनीकरण का काम शुरू कर दिया था।

आइएमसी के दस्तावेजों के अनुसार, महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने 25 नवंबर, 2022 के एक प्रस्ताव के माध्यम से भागीरथपुरा के वार्ड संख्या 11 के लिए एक व्यापक पाइपलाइन परियोजना को मंजूरी दी थी। इसकी अनुमानित लागत 2.38 करोड़ रुपए थी और इसे दस महीने में पूरा किया जाना था। लेकिन काम धीमी गति से आगे बढ़ा। अब देरी की समीक्षा की जा रही है। इन सब से पहले भी इंदौर की पेयजल और सीवेज व्यवस्था की खराब स्थिति को लेकर चिंताएं जताई जा चुकी थीं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा आइएमसी जल आपूर्ति से लिए गए 2018 के जल नमूनों के आडिट में कहा गया था कि सभी नमूनों में आयरन, नाइट्रेट, कैल्शियम, ई-कोलीफार्म की मात्रा निर्धारित बीआइएस मानदंडों से अधिक थी। इससे यकृत, हृदय, अग्नाशय को क्षति, मधुमेह, दस्त, उल्टी, पेट दर्द, पाचन संबंधी समस्याएं, पीलिया, टाइफाइड जैसी बीमारियां हो सकती हैं। आइएमसी ने जवाब दिया था कि शहर की पानी की पाइपलाइनें बहुत पुरानी थीं और विकास कार्यों से क्षतिग्रस्त हो गई थीं।

साल 2023 में गठित राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की एक समिति ने अपनी रपट में कहा था कि आइएमसी लगभग 367.8 एमएलडी सीवेज उत्पन्न करता है, लेकिन उसने लगभग 910 अवैध कालोनियों द्वारा पानी के अवैध दोहन को ध्यान में नहीं रखा। राज्य ने उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि त्रासदी होने से पहले पाइपलाइन का 80 फीसद काम पूरा हो चुका था। पुरानी लाइनों को बंद किया जाना था, लेकिन नई लाइनों के लिए कार्य आदेश में देरी के कारण पुरानी लाइनें उपयोग में बनी रहीं।

बीमारियों का हर शहर में प्रकोप

इंदौर की त्रासदी ने बताया कि देश की जल आपूर्ति प्रणाली कितनी नाजुक है। फरवरी 2025 और जनवरी 2026 के बीच, गंदे पानी से दूषित पाइप के पानी ने 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कम से कम 26 शहरों में बीमारियों का प्रकोप फैलाया। इससे एक दीर्घकालिक देशव्यापी शहरी संकट का पता चला। नल के दूषित पानी से देश के महानगरों, राज्य की राजधानियों और छोटे शहरों में लोग बीमार पड़ रहे हैं। जनवरी 2025 से सात जनवरी 2026 के बीच, 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 26 शहरों (इनमें 16 राज्य राजधानियां शामिल हैं) में गंदे पानी से पाइप का दूषित पानी पीने से कम से कम 5,500 लोग बीमार हुए। कम से कम 34 लोगों की मौत हो गई।

मीडिया खबरों और प्रभावित राज्यों के आधिकारिक बयानों के अनुसार, दस्त सबसे आम बीमारी थी। इसके बाद टाइफाइड, हेपेटाइटिस और लंबे समय तक बुखार के मामले सामने आए। शहरों में इसका कारण जगजाहिर है। लगभग हर मामले में, दूषित होने का कारण पीने के पानी में नालों का मिलना पाया गया है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पुरानी, जंग लगी या खराब तरीके से बिछाई गई पानी की पाइपलाइनें सीवर लाइनों के करीब से गुजरती हैं। किसी भी रिसाव या दबाव में कमी के कारण गंदा पानी सीधे घरों की आपूर्ति में पहुंच जाता है।

ज्यादातर मामलों में, दशकों पुरानी पाइपलाइनें ही समस्या की जड़ में हैं। कई शहर आज भी 40 साल से अधिक पुरानी जल वितरण प्रणाली पर निर्भर हैं। दिल्ली जल बोर्ड की एक रपट के अनुसार, दिल्ली में लगभग 18 फीसद पानी की पाइपलाइनें 30 साल से अधिक पुरानी हैं। सीवर लाइनों के समानांतर या नीचे बिछाई गईं इन पाइपलाइनों में दरारें बार-बार पेयजल के दूषित होने का खतरा पैदा करती हैं। राजधानी दिल्ली में संकट महज सीवर लाइनों का नहीं है, एक महीने पहले हुए खुलासे के अनुसार भूमिगत जल में यूरेनियम की बढ़ी हुई मात्रा पाई गई है।

लेकिन दिल्ली और देश के शहरों में सबसे बड़ी चिंता इंदौर त्रासदी के बाद घरों तक होने वाली दूषित जल आपूर्ति है। वैसे तो देश में जल प्रदूषण की घटनाएं अक्सर मानसून के महीनों से जुड़ी होती हैं, जब बाढ़ और नालियों की उफान से सीवेज के रिसाव का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन पिछले एक साल में दर्ज कम से कम 34 घटनाओं की समीक्षा से पता चलता है कि सीवेज से दूषित पाइप का पानी अब केवल एक मौसमी घटना नहीं रह गई है।

महज एक महीने के भीतर यानी दिसंबर 2025 और सात जनवरी 2026 के बीच कई लोगों की मौत हो गई और 3,500 से अधिक लोग बीमार पड़ गए।

इनमें से ज्यादातर ने दूषित नल का पानी पीया था। साल 2025 के आखिर में पटना (बिहार), रायपुर (छत्तीसगढ़), बंगलुरु (कर्नाटक), देहरादून (उत्तराखंड), गांधीनगर (गुजरात), गुवाहाटी (असम), जम्मू , रांची (झारखंड) सहित देश भर के शहरों से पाइप से आने वाले पानी के दूषित होने की कम से कम 11 मामले सामने आए। इंदौर (मध्य प्रदेश), चेन्नई (तमिलनाडु) और गुरुग्राम (हरियाणा) के मामले चर्चा में रहे। इनमें राजधानियों का शामिल होना शहरी पेयजल बुनियादी ढांचे की जर्जरता को बताता है।

गुजरात की राजधानी गांधीनगर में जनवरी की शुरुआत में दूषित पानी पीने के बाद 150 से अधिक बच्चों को टाइफाइड के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया। बंगलुरु में, लिंगराजपुरम के केएसएफसी लेआउट में कम से कम 30 परिवारों ने चार जनवरी, 2026 को दस्त और पेट के संक्रमण की शिकायत की। इसी महीने में कम से कम छह अन्य शहरों से भी इसी तरह की घटनाएं सामने आईं। पटना की कंकरबाग हाउसिंग कालोनी में निवासियों का कहना है कि इंदौर जैसी ही समस्या सामने आ रही है। कई खंडों में नल का पानी इतना प्रदूषित है कि इसका इस्तेमाल नहाने या कपड़े धोने के लिए भी नहीं किया जा सकता।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में, कचना हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र के निवासियों को एक महीने से अधिक समय से बदबूदार और स्पष्ट रूप से प्रदूषित नल का पानी मिल रहा है। इससे लगभग 100 लोग बीमार पड़ गए हैं। झारखंड की राजधानी रांची में, नगर निगम के अधिकारियों ने क्षतिग्रस्त या टूटी हुई पाइपलाइनों वाले 300 से अधिक स्थानों की पहचान की है। इससे पानी की आपूर्ति में सीवर की गंदगी के मिलने का खतरा बढ़ गया है।

गुरुग्राम भी इससे अछूता नहीं रहा। दिसंबर की शुरुआत में, सेक्टर 70ए के निवासियों ने नल का पानी पीने के बाद दस्त और पेट संबंधी बीमारियों की शिकायत की। लगभग 60 से 70 लोग प्रभावित हुए।

संकट सिर्फ शहरों का नहीं

दूषित जल का संकट महज शहरी नहीं है। तीन महीने पहले उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी विकासखंड में बुखार ने पांच गांवों – देवलीबागड़, विवाड़ी, धुरतक, माला और खेती में कहर बरपाया था। इससे नौ लोगों की मौत हो गई थी और 50 से अधिक लोग गंभीर रूप से बीमार हुए थे। पहले इस घटना को मौसम में बदलाव का नतीजा मानकर नजरअंदाज कर दिया गया था। जब इन मौतों का कारण जानने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में चिकित्सकों के दल भेजे भेजे तो पता चला कि दूषित पेयजल के माध्यम से फैले जीवाणु संक्रमण के कारण यह त्रासदी हुई।

जांच से पता चला कि गांवों को पानी की आपूर्ति करने वाले पानी के टैंक कोलीफार्म जीवाणु से प्रदूषित थे। ये टाइफाइड, दस्त और हैजा जैसी बीमारियों को फैला सकते हैं। ग्रामीण कई महीनों से पानी की खराब आपूर्ति की शिकायत कर रहे हैं। अस्पताल में भर्ती 11 मरीजों के रक्त के नमूनों की जांच की गई, जिनमें से चार में टाइफाइड की पुष्टि हुई। यह बीमारी दूषित पानी के कारण फैली थी। बाद में प्रभावित गांवों में निवासियों की जांच और उपचार के लिए 16 स्वास्थ्य दल तैनात किए गए। प्रारंभिक जांच से पता चला कि पाइपलाइन में खराबी के कारण गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया था। यह खराबी कई हफ्तों तक किसी की नजर में नहीं आई।

प्रणालीगत विफलता का जिम्मेदार कौन

देश के शहरी क्षेत्रों में, नगर निगम और शहरी स्थानीय निकाय पेयजल की आपूर्ति, गुणवत्ता और सुरक्षा के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार हैं। राज्य स्तरीय एजंसियां, जिनमें सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग, जल आपूर्ति बोर्ड और शहरी विकास विभाग शामिल हैं-थोक जल और वितरण नेटवर्क की योजना बनाती हैं। इन्हें वित्त पोषित करती हैं और उनका संचालन भी करती हैं। स्वास्थ्य निगरानी का कार्य राज्य के स्वास्थ्य विभागों के अंतर्गत आता है, जबकि प्रकोप का पता लगाने का कार्य केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम द्वारा निर्देशित होता है। राष्ट्रीय स्तर पर, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों का मंत्रालय अमृत और अमृत 2.0 जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से शहरी जल अवसंरचना की देखरेख करता है, जबकि पेयजल गुणवत्ता मानकों को भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा निर्धारित किया जाता है।

फिर भी, बार-बार होने वाले प्रकोप यह संकेत देते हैं कि प्रशासन काफी हद तक प्रतिक्रियात्मक बना हुआ है, और हस्तक्षेप तभी शुरू होता है, जब लोग बीमार पड़ जाते हैं। ये बार-बार होने वाली घटनाएं शहरी जल प्रशासन की प्रणालीगत विफलता की ओर इशारा करती हैं, न कि छिटपुट चूक की ओर, जिससे सुरक्षित पेयजल के मूल अधिकार के उल्लंघन के बारे में चिंताएं बढ़ जाती हैं। सरकार ने जल-सुरक्षित शहरों के निर्माण के घोषित लक्ष्य के साथ 1 अक्तूूबर, 2021 को अटल कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन 2.0 का शुभारंभ किया। इसके अंतर्गत, पेय जल सर्वेक्षण इसे जल की गुणवत्ता, मात्रा और विस्तार के आधार पर शहरों का मूल्यांकन करने के लिए एक प्रतिस्पर्धी मूल्यांकन के रूप में शुरू किया गया था।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अमृत के अंतर्गत सर्वेक्षण किए गए 485 शहरों में से 46 शहरों के निवासियों को सौ फीसद स्वच्छ जल उपलब्ध कराने का दावा करने वाले शहरों की संख्या 29 फरवरी, 2024 तक इस मानदंड को पूरा करने वाले शहरों की संख्या दस फीसद से भी कम थी। आर्थिक सर्वेक्षण साल 2023-24 का अनुमान है कि साल 2030 तक भारत की 40 फीसद से अधिक आबादी शहरों में रहेगी। इससे जल तंत्र सहित पुरानी शहरी सेवाओं पर दबाव और बढ़ जाएगा।