इतिहास खुद को दोहराता है। जब ऐसा होता है, तो समाज और राजनीति में आए बदलावों की झलक मिलती है। यूपी के देवरिया जिले में 44 साल के अंतराल पर हुई दो घटनाएं यही नजारा पेश करती हैं।
2 अक्टूबर 2023 को देवरिया के रुद्रपुर तहसील के फतेहपुर में दो परिवारों के बीच ज़मीनी विवाद में भयंकर लड़ाई हुई। कथित तौर पर प्रेम चंद्र यादव की उनके प्रतिद्वंद्वी सत्य प्रकाश दुबे के परिवार के सदस्यों ने हत्या कर दी। जवाबी हमले में दुबे के परिवार के चार सदस्य मारे गये। राज्य में इस तरह के विवाद पुलिस और रेवेन्यू एडमिनिस्ट्रेशन के लिए नियमित मामले हैं।
44 साल पहले क्या हुआ था?
फतेहपुर से लगभग 45 किमी दूर, नारायणपुर गांव (तब देवरिया में, अब कुशीनगर जिले में, देवरिया की सीमा पर) में इसी तरह की एक घटना हुई थी। हालिया घटना की तरह उसमें भी राजनीतिक प्रभाव शामिल था। उस घटना की गूंज विधानसभा तक पहुंची थी।
11 जनवरी, 1980 को एक बस ने एक वृद्ध महिला को कुचल दिया और ग्रामीणों ने वाहन के मालिक से मुआवजे की मांग की। बस मालिक, पुलिस और ग्रामीणों के बीच मुआवजे पर सहमति नहीं बन पाने से ग्रामीणों का पारा चढ़ गया। फिर, अचानक 14 जनवरी को मकर संक्रांति की रात (जिस दिन इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी), पुलिस ने ग्रामीणों पर हमला किया। कथित तौर पर लूटपाट, पिटाई और महिलाओं के साथ बलात्कार किया, जिसमें कम से कम दो लोग मारे गए। गांव के अधिकांश निवासी अनुसूचित जाति और मुस्लिम थे।
चिंताजनक बात यह है कि नारायणपुर की घटना को राज्य की राजधानी लखनऊ तक पहुंचने में एक सप्ताह से अधिक का समय लग गया। 8 फरवरी, 1980 को मुख्यमंत्री बनारसी दास ने विधानसभा को बताया कि उन्हें इस घटना की जानकारी 23 जनवरी को एक अखबार की रिपोर्ट के माध्यम से मिली। मुख्यमंत्री दास और उनकी जनता पार्टी सरकार पहले से ही मुश्किल स्थिति में थी क्योंकि इंदिरा गांधी की सरकार केंद्र में लौट आई थीं। ऐसे में जनता पार्टी के कई विधायक कांग्रेस में शामिल होने जा रहे थे। नारायणपुर की घटना उस हुई, जब राज्य की सरकार बुरे दौर से गुजर रही थी।
सत्ताधारी दल के विधायक भी सीएम पर आक्रामक
सीएम ने पास के ही देवरिया के बरहज विधानसभा क्षेत्र से विधायक और अपनी सरकार में लघु उद्योग राज्य मंत्री मोहन सिंह को गांव का दौरा करने का निर्देश दिया। इस मामले पर विधानसभा में तीन बार अलग-अलग नियमों के तहत चर्चा हुई और हर बार जनता पार्टी के विधायक इस विषय पर विपक्षी दलों की तुलना में अधिक आक्रामक थे।
दलितों के पक्ष में सवर्णों ने संभाला मोर्चा
पीड़ित दलित थे। लेकिन दिलचस्प बात यह थी कि मोहन सिंह, एक राजपूत, पूरे दिल से नारायणपुर के पीड़ितों के साथ थे। इसी तरह, जनता पार्टी के नेता बांके लाल, रामकोला से विधायक, जिसके अंतर्गत नारायणपुर आता है, और सलेमपुर से हरि केवल प्रसाद ने सदन में इस मुद्दे को उठाया। बांके लाल ने तो विधायक पद से इस्तीफा देने की भी इच्छा जताई थी। विपक्षी कांग्रेस के विधायकों ने भी इस मुद्दे पर सरकार को निशाने पर लिया, लेकिन सत्ता पक्ष के विधायक भी कम आक्रामक नहीं थे।
मोहन सिंह ने विधानसभा में विस्तृत बयान दिया, जिसमें उन्होंने हाता और कप्तानगंज थाने की पुलिस द्वारा किये गये अत्याचारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “(ग्रामीणों की बात सुनने के बाद) मुझे शर्म आती है कि 20वीं सदी में एक इंसान दूसरे इंसानों के खिलाफ ऐसा (अत्याचार) कर सकता है। वहां उन्हें पीटा गया और कप्तान गंज थाने लाया गया और वहां फिर से पीटा गया। महिलाओं को भी पीटा गया।”
जल्द ही देवरिया के एसएसपी और डीआइजी का तबादला कर दिया गया। तीन थानेदारों को निलंबित कर दिया गया। कई उप-निरीक्षकों और कांस्टेबलों को दूसरे जिलों में भेज दिया गया और न्यायिक जांच के आदेश दिए गए।
प्रधानमंत्री ने गांव का किया दौरा
राजनीति चरम पर थी। कुछ दिन पहले ही कांग्रेस बहुमत के साथ लौटी थी। 7 फरवरी, 1980 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गांव का दौरा किया। नारायणपुर से लौटते समय, उन्होंने गोरखपुर में कहा कि बनारसी दास की सरकार को अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि यूपी सरकार ने नारायणपुर जाने के बजाय पुलिसकर्मियों की बात मान ली।
बाद में बनारसी दास ने अपना बचाव करते हुए कहा, “मैंने कड़ी कार्रवाई की है। अगर मैं गांव (नारायणपुर) गया होता तो प्रधानमंत्री ने आरोप लगाती कि मैं जांच को प्रभावित करने के लिए वहां गया था।”
जनता पार्टी के नेताओं ने सीएम के समर्थन में रैली की और आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी के बयान को राज्य सरकार के काम में हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए। लॉ एंड ऑर्डर राज्य का विषय है। तीन साल पहले, मोराजी देसाई के नेतृत्व वाली केंद्र की जनता पार्टी सरकार ने यूपी की कांग्रेस सरकार (जिसमें एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे) को बर्खास्त कर दिया था। देवरिया की घटना ने केंद्र में लौटी कांग्रेस सरकार को बदला लेने का मौका दे दिया।
18 फरवरी, 1980 को उत्तर प्रदेश सहित नौ गैर-कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दी गईं। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की सरकारों को भी इसी तरह का सामना करना पड़ा।
अब राजनीति में क्या बदलाव आया है?
अब नारायणपुर की घटना के 44 साल बाद, देवरिया की हत्याओं पर राजनेताओं की प्रतिक्रिया, राजनीति में आए बदलावों को दिखा रही है। पहले राजनेता जिन सिद्धांतों के लिए खड़े थे, अब उनमें बदलाव आया है।
1980 में नेता, अपनी जाति और पार्टी से जुड़े होने के बावजूद, पीड़ितों के साथ खड़े थे। 2023 में सत्तारूढ़ भाजपा (एक पार्टी जो जाति की राजनीति में शामिल नहीं होने का दावा करती है।) के विधायक सिर्फ अपनी जाति के पीड़ितों से मिल रहे हैं।
उदाहरण के लिए, देवरिया के विधायक शलभ मणि त्रिपाठी अक्सर दुबे परिवार से मिलने गए, लेकिन उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से पुष्टि की कि वह प्रेम चंद्र यादव के परिवार से नहीं मिले, जो सबसे पहले मारे गए थे। दोनों घरों के बीच महज 2 किमी का फासला है। फतेहपुर गांव रुद्रपुर विधानसभा सीट के अंतर्गत आता है, जहां से बीजेपी के जय प्रकाश निषाद विधायक हैं। वह भी, देवरिया में दुबे के बेटे से मिलने गए, लेकिन गांव में नहीं गए।
योगी आदित्यनाथ और उनके डिप्टी ब्रजेश पाठक ने गोरखपुर अस्पताल का दौरा किया जहां सत्य प्रकाश दुबे के घायल बेटे को भर्ती कराया गया था, लेकिन गांव का दौरा नहीं किया। योगी के दूसरे डिप्टी केशव प्रसाद मौर्य भी गांव नहीं आये। विपक्ष के नेता अखिलेश यादव ने गांव का दौरा किया और दोनों परिवारों से मुलाकात की, लेकिन दुबे के बेटे ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। 44 साल में यूपी में यही बदलाव आया है।
