डोनाल्ड ट्रंप ने 20 जनवरी 2025 को दूसरी बार अमेरिका के 47वें प्रेसिडेंट के तौर पर शपथ ली। उन्हें शपथ लिए हुए एक साल हो गया है। उन्होंने एक साल में जो पॉलिसी अनाउंसमेंट और ऑर्डर दिए हैं, उसका पूरी दुनिया पर व्यापक असर देखने को मिला है। अमेरिका फर्स्ट के नाम पर शुरू हुआ नया टैरिफ राज वैश्विक व्यापार के लिए झटका साबित हुआ, तो दूसरी ओर संघर्षों और सीजफायर की अजीबो-गरीब कूटनीति से दुनिया एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में खड़ी दिखी। आइए अब जानते हैं कि ट्रंप के एक साल के कार्यकाल में ग्लोबल पॉलिटिक्स पर कैसा असर देखने को मिला।
ट्रंप का नया टैरिफ राज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया भर के ज्यादातर देशों से अमेरिका में आने वाले सामानों पर भारी भरकम टैरिफ लागू कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति का तर्क है कि इन टैक्स से मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार पैदा होंगे। ट्रंप ने जिन-जिन देशों पर टैरिफ लगाया है उसमें प्रमुख तौर पर भारत, ब्राजील, वियतनाम, जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों का नाम भी शामिल है। ट्रंप ने दिसंबर 2025 में कहा, टैरिफ मेरा फेवरेट इंग्लिश वर्ड है। इसकी मदद से मैंने 10 महीने में दुनिया भर में 8 युद्धों को रोका है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और कई आर्थिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि टैरिफ से केवल अमेरिका ही नहीं, दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता हुआ दिख रहा है और आर्थिक वृद्धि में भी गिरावट हो सकती है।
ट्रंप ने बदला मेक्सिको की खाड़ी का नाम
सत्ता में वापसी के महज एक महीने बाद ही ट्रंप ने मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ रखने की घोषणा की। ट्रंप ने कार्यकारी आदेश 14172 पारित किया। ट्रंप ने कहा, “जैसे-जैसे मेरा प्रशासन अमेरिकी गौरव के इतिहास को बहाल कर रहा है, यह हमारे महान राष्ट्र के लिए सही है कि हम एक साथ आएं और इस महत्वपूर्ण अवसर और अमेरिका की खाड़ी के नामकरण का जश्न मनाएं।” गौरतलब है कि मेक्सिको की खाड़ी को बीते 400 सालों से इसी नाम से जाना जाता था। हालांकि ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी शहर न्यू मेक्सिको की वजह से इसे मेक्सिको की खाड़ी कहा जाता था।
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरों को सेना ने किया गिरफ्तार
वेनेजुएला में ट्रंप ने निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाकर अमेरिका का प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की है। ट्रंप ने अमेरिकी एलीट डेल्टा फोर्स को काराकास भेजा और मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर लिया। दोनों अब अमेरिका में हैं, जहां उन पर मुकदमा चलाया जाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में घोषित डोनरो सिद्धांत में दावा किया कि वेनेजुएला के तेल पर अब अमेरिका का स्वामित्व है। इतना ही नहीं ट्रंप ने कई तेल कंपनियों को वेनेजुएला में कारोबार करने के लिए आमंत्रित किया है। ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हैगिस वेनेजुएला का शासन संभालेंगे।
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ट्रंप और ग्रीनलैंड
ग्रीनलैंड में ट्रंप की दिलचस्पी कोई नई बात नहीं है। वह पहले भी इस क्षेत्र को खरीदने का प्रस्ताव रख चुके हैं। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को फिर दोहराया कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करने के अपने लक्ष्य से पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है। उन्होंने सेना के दम पर आर्कटिक द्वीप पर कब्जा करने की संभावना से इनकार नहीं किया और नाटो सहयोगियों पर जमकर हमला बोला। लेकिन बाद में ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उन्हें लगता है कि हम कुछ ऐसा हल निकालेंगे जिससे नाटो भी बहुत खुश होगा और हम भी बहुत खुश होंगे।
अब बात ग्रीनलैंड की करें तो यह दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और यह आर्कटिक क्षेत्र में मौजूद है। लगभग 22 लाख वर्ग किलोमीटर (836,330 वर्ग मील) क्षेत्रफल वाला यह द्वीप जर्मनी के आकार से लगभग छह गुना बड़ा है। यह दुनिया का सबसे कम आबादी वाला क्षेत्र भी है, जिसकी आबादी लगभग 56000 लोग है। नॉर्थ अमेरिका और आर्कटिक के बीच होने की वजह से यह जहाजों की निगरानी के लिए एकदम सही जगह है। शीत युद्ध के चरम पर अमेरिका की योजना द्वीप पर परमाणु मिसाइलें तैनात करने की थी, लेकिन इंजीनियरिंग संबंधी समस्याओं और डेनमार्क की आपत्तियों के कारण उसने इस परियोजना को छोड़ दिया।
कनाडा को अमेरिका का 51वां स्टेट बनाने की ट्रंप ने की थी बात
अमेरिका का व्यापारिक साझेदार कनाडा भी ट्रंप की वापसी के दबाव को महसूस कर रहा है। हालांकि, ट्रंप ने किसी भी तरह का औपचारिक क्षेत्रीय दावा नहीं किया है, लेकिन ओटावा को अमेरिका का 51वां स्टेट बनाने की उनकी बयानबाजी ने कई कनाडाई अधिकारियों को नाराज कर दिया है। साथ ही ट्रंप ने कनाडा को वॉर्निंग दी कि अगर वह चीन के साथ व्यापार समझौता करता है, तो वह सीमा पार से आने वाले सभी सामानों पर 100% टैरिफ लगा देंगे। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर लिखा, “अगर कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को लगता है कि वह कनाडा को चीन के लिए ‘ड्रॉप ऑफ पोर्ट’ बना देंगे, जहां से चीन अमेरिका में सामान और उत्पाद भेजेगा, तो वह बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं।”
रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की भूमिका
रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई मौकों पर बड़े दावे किए, उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में इसे ही सबसे बड़ा मुद्दा भी माना। लेकिन जानकार मानते हैं कि उनका सबसे बड़ा फेलियर भी यही पर देखने को मिला है। असल में जब बाइडेन प्रशासन था, साफ कहा गया था कि यूक्रेन को खुली मदद दी जाएगी, जितनी मिलिट्री सहायता चाहिए, अमेरिका वो देता रहेगा। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की ऐसी कोई मंशा नहीं है, इसी वजह से माना जा रहा है कि वे ज्यादा सख्त रहने वाले हैं।
उनका यही रुख जेलेंस्की को भी समझौता करने पर मजबूर कर सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप कई मौकों पर खुलकर पुतिन का समर्थन कर चुके हैं, यहां तक कहा गया है कि युद्ध तब रुकेगा जब जेलेंस्की अपनी जिद छोड़ देंगे, जब वे अपनी जमीन के कुछ हिस्सों को रूस को सौंप देंगे। लेकिन जब ये प्रस्ताव भी काम नहीं आए तो ट्रंप ने पुतिन को भी मनाने की कोशिश की, कभी धमकी तो कभी कूटनीति का सहारा लिया। अभी के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है और इसके रुकने के आसार नजर नहीं आ रहे।
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ईरान में सत्ता विरोधी प्रदर्शन को अमेरिका का समर्थन
ईरान में सत्ता विरोधी प्रदर्शन कर रहे लोगों को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का समर्थन मिल रहा है। उन्होंने पिछले हफ्ते पोलिटिको से कहा, “ईरान में नए नेतृत्व के बारे में सोचने का वक्त आ गया है।” उन्होंने ईरानी नागरिकों से विरोध प्रदर्शन जारी रखने और संस्थानों पर कब्जा करने की अपील भी की थी। हालांकि, अगले दिन ट्रंप ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि बंदियों को फांसी देने की योजना फिलहाल रोकी गई है। दूसरी ओर, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने ट्रम्प पर ईरान में हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरानी जनता को हुए नुकसान और मौतों के लिए जिम्मेदार हैं।
66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों का हिस्सा नहीं रहेगा अमेरिका
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 7 जनवरी को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को आधिकारिक रूप से बाहर निकालने की घोषणा की है। इसमें से 31 यूनाइटेड नेशंस की संस्थाएं हैं। वहीं 35 नॉन-यूएन इंटरनेशनल अलायंस हैं। इसमें भारत की पहल पर बना इंटरनेशनल सोलर अलायंस का नाम भी शामिल है।
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