गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहे ईरान में बगावत बेकाबू होने लगी है। ईरान के कई शहरों में जारी हिंसक प्रदर्शनों में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा की भारी गिरावट ने आम लोगों का गुस्सा भड़का दिया है।
विरोध-प्रदर्शनों की शुरुआत कुछ हफ्ते पहले हुई, जब ईरान की मुद्रा रियाल टूटकर इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। एक अमेरिकी डालर की कीमत करीब 14.2 लाख रियाल हो गई।
इसके बाद खाने-पीने की चीजों के दाम तेजी से बढ़ गए और व्यापार करना बेहद मुश्किल हो गया। इसी के विरोध में तेहरान के ग्रैंड बाजार और मोबाइल फोन बाजार के दुकानदारों ने हड़ताल कर दी और अपनी दुकानें बंद कर दीं। फिर आंदोलन तेहरान से निकलकर इस्फहान, शिराज, यज्द और केरमानशाह जैसे बड़े शहरों तक फैल गया।
आर्थिक बदहाली
ईरान में महंगाई 2025 में 30 फीसद से ज्यादा बढ़कर 52 फीसद से अधिक हो गई, जिसमें औसत मासिक खाद्य महंगाई सात फीसद तक पहुंच गई। ईरानी रियाल ने पिछले वर्ष की तुलना में अपने मूल्य का आधे से अधिक हिस्सा खो दिया और इस सप्ताह अमेरिकी डालर के मुकाबले गिरकर 1.46 मिलियन के रेकार्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। जब विरोध प्रदर्शनों ने सरकार-विरोधी रंग ले लिया तब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनका देश प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए पूरी तरह तैयार है। तेहरान ने इसे और अन्य अमेरिकी नेताओं के बयानों को विदेशी हस्तक्षेप का सबूत माना।
प्रासंगिक सवाल
ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के तेजी से और व्यापक रूप से सत्ता-विरोधी स्वरूप में बदलने को देखते हुए, यह सवाल हमेशा प्रासंगिक रहा है कि क्या वे ईरानी राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। इस बात के बहुत कम प्रमाण हैं कि ईरानी लोग सार्वजनिक प्रशासन के लिए जिम्मेदार राज्य की नौकरशाही संस्थाओं को पलटने के लिए तैयार हैं। ईरान के सामने कई कमजोरियां हैं।
भू-राजनीतिक रूप से, सीरिया में अपने एक सहयोगी देश (बशर अल असद शासन) के पतन, लेबनान में अपने प्रमुख गैर-सहयोगी देश (हिज्बुल्लाह) के विघटन और ट्रंप प्रशासन द्वारा समर्थित इजराइल के बढ़ते प्रभुत्व के कारण, यह संभवत: 1979 के बाद से अपने सबसे कमजोर दौर में है।
अलग-अलग कारक
इस्लामी गणराज्य में आर्थिक कठिनाई हमेशा असंतोष का एक कारण रही है। पिछले दो दशकों में तेहरान के तेजी से सत्तावादी शासन के कारण इसमें शासन-विरोधी भावनाओं का अंतर्प्रवाह भी देखने को मिला है।
जब भी कोई मजबूत आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक कारण सामने आया है, बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों ने शासन के अंत की मांग को जन्म दिया है। ईरान में इस तरह के राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन आखिरी बार 2022-23 में हुए थे। तब इसका कारण सामाजिक था – शासन द्वारा कार्यकर्ता महसा अमिनी की हत्या, क्योंकि उन्होंने कठोर हिजाब कानूनों का पालन नहीं किया था।
तेहरान का वर्तमान दृष्टिकोण
सरकार विरोधी जन प्रदर्शनों से निपटने के मामले में ईरान ने एक लंबा और कठिन समय बिताया है। 1979 की क्रांति की उपज, इस्लामी गणराज्य ने हमेशा प्रदर्शनकारियों की मांगों पर सीमित रियायतें ही दी हैं।
क्रमिक रियायतों ने ही राजशाही की पकड़ को कमजोर किया और विपक्ष को एकजुट होने का अवसर दिया (अन्य कारकों के साथ)। इसने आम तौर पर हिंसक दमनकारी कार्रवाइयों को अंजाम दिया है, कभी-कभी बासिज (मिलिशिया जो आमतौर पर विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए आक्रामक सैनिकों की आपूर्ति करता है) द्वारा नेतृत्व किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रदर्शनकारियों की बड़ी संख्या में मौत हुई है।
ईरान अगर कमजोर पड़ता है तो बहुध्रुवीय दुनिया के लिए झटका है। पश्चिम एशिया में और अस्थिरता बढ़ सकती है। इराक, लीबिया और सीरिया में सत्ता परिवर्तन कर अमेरिका ने क्या अपना वहां दबदबा बढ़ा लिया? पश्चिम एशिया में कई देश कृत्रिम तरीके से बनाए गए हैं और ऐसा पश्चिम के देशों ने ही किया है।
अश्विनी महापात्रा, पश्चिम एशिया मामलों के जानकार
भारत की विदेश नीति के लिए ईरान सबसे बड़ी चुनौती है। ईरान भारत के लिए अहम है। खास कर मध्य एशिया और अफगानिस्तान पहुंचने के लिए, व्यापार मार्क के लिहाज से बहुत अहम है। लेकिन जब हम फारस की खाड़ी की बात करते हैं तो ईरान हमारे लिए एक बोझ बन जाता है। इस इलाके का कोई भी देश ईरान को पसंद नहीं करता है।
तलमीज अहमद, पूर्व राजनयिक
समर्थकों की नाराजगी
इस बार सबसे अहम बात यह है कि आंदोलन की शुरुआत बाजारी समुदाय से हुई, जो ऐतिहासिक रूप से इस्लामिक गणराज्य का समर्थक रहा है। ईरान में बाजारी और धार्मिक नेतृत्व के बीच पुराना गठबंधन रहा है। इतिहास में दुकानदारों ने कई बार सत्ता परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाई है।
इस बार मुद्रा अस्थिरता और गिरती अर्थव्यवस्था ने उनके व्यापार को इतना प्रभावित किया कि वही वर्ग अब सड़कों पर उतर आया। यही विरोध आगे चलकर हिंसक रूप ले बैठा। वहीं, सरकार आर्थिक मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों और शासन परिवर्तन की मांग करने वालों के बीच फर्क करने की कोशिश कर रही है।
ईरान द्वारा इस बार प्रदर्शनकारियों की वैध मांगों को तुरंत स्वीकार करना एक आश्चर्यजनक बदलाव है, जबकि बल प्रयोग का सिलसिला जारी है। ईरान में विरोध प्रदर्शनों का संगठनात्मक ढांचा अभी अव्यवस्थित है।
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