देश की राजनीति इन दिनों कई मोर्चों पर एक साथ उथल-पुथल से गुजर रही है। कहीं राज्यसभा का अंकगणित नेताओं की नींद उड़ा रहा है, तो कहीं संवैधानिक पद से हटे व्यक्ति का निजी संघर्ष चर्चा में है। चुनावी प्रक्रियाएं, पुराने विवाद और नए सियासी दांव राजनीति की दिशा तय कर रहे हैं।

भतीजे का सहारा

शरद पवार चिंतित हैं। उनका चिंतित होना स्वाभाविक भी है। अप्रैल में राज्यसभा का उनका कार्यकाल खत्म हो जाएगा। विधानसभा में उनकी पार्टी के इस समय सिर्फ दस विधायक हैं। जबकि राज्यसभा की एक सीट के लिए 35 वोट चाहिए। राज्य में कुल सात सीटों का चुनाव होगा। विधानसभा के संख्याबल के हिसाब से महायुति यानी सत्तारूढ़ गठबंधन का छह सीट जीतना तय है। विपक्ष को महज एक सीट मिल सकती है, वह भी तभी जब महाविकास अघाडी एकजुट रहे। अघाडी में उद्धव ठाकरे के 20 और कांग्रेस के 16 विधायक हैं। उद्धव का दावा प्रबल होगा। कांग्रेस के समर्थन से वे अपना एक उम्मीदवार जिता सकते हैं। सेवानिवृत्त होने वाले सदस्यों में पवार के अलावा प्रियंका चतुर्वेदी, फौजिया खान और रजनी पाटिल हैं। महायुति के तीन सदस्यों में रामदास अठावले भी हैं। माना जा रहा है कि महायुति उन्हें फिर मौका देगी। रही शरद पवार की संभावना, तो उन्हें भतीजे अजित पवार का सहारा लेना पड़ेगा। महायुति में अपने हिस्से की राज्यसभा सीट अगर भतीजे ने चाचा को दी, तभी शरद पवार की मुराद पूरी होगी। शहरी निकाय चुनाव में जिस तरह चाचा-भतीजे ने हाथ मिलाया है, उसे देखते हुए भतीजे की मदद नामुमकिन नहीं। वैसे भी इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीति में परिवार के मिलन का समय है। ठाकरे परिवार भी अपने अस्तित्व के लिए एकजुट हो चुका है।

बेघर धनखड़

जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से पिछले साल 21 जुलाई को त्यागपत्र दिया था। पांच महीने से ज्यादा समय बीत चुका है, पर वे अभी तक बेघर हैं। दक्षिणी दिल्ली के छतरपुर स्थित एक फार्महाउस में वे बतौर मेहमान रह रहे हैं, जो उनके पारिवारिक मित्र चौटाला परिवार का है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को सेवानिवृत्ति के बाद राजधानी में सरकारी आवास मिलता है। आमतौर पर उनके लिए आवास की व्यवस्था सेवानिवृत्ति से पहले ही हो जाती है, पर चूंकि धनखड़ ने त्यागपत्र अचानक दिया था लिहाजा उनके मामले में यह संभव नहीं हो सका। उन्होंने अपने लिए सुनहरी रोड का 9 नंबर बंगला चाहा था, पर यह बंगला भाजपा के नए कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन को आबंटित हो चुका है। धनखड़ की संजीदगी की दाद देनी होगी। अपने त्यागपत्र पर आज तक मुंह नहीं खोला, अन्यथा सरकार को असहज स्थिति में ला सकते थे।

गफलत में राजनीतिक दल

निर्वाचन आयोग ने देश भर में मतदाता सूची की गहन जांच (एसआइआर) और जांच प्रक्रिया (एसआर) शुरू की है। इसे लेकर आम जनता ही नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक दलों के नेता भी फंस रहे हैं। कई राज्यों में एसआइआर की प्रक्रिया इतने लंबे समय बाद हो रही है कि स्थानीय दलों के पास इससे संबंधित प्रक्रियागत जानकारी ही उपलब्ध नहीं है। इसलिए ये दल बार-बार आयोग के सवालों के घेरे में फंस रहे हैं। वे कमरे के अंदर की बैठकों में अलग और बाहर के सियासी मैदान में अलग बातें उठा रहे हैं। इन नेताओं को अब आयोग ने यह कहकर फंसा दिया है कि मतदाता सूची पर राजनीतिक दलों की आपत्तियों की वजह से एक लंबे समय बाद आयोग को एसआइआर शुरू करना पड़ रहा है।

नया विवाद

अंकिता भंडारी प्रकरण से उत्तराखंड की सियासत में भूचाल आ गया है। अंकिता की 2022 में हत्या कर दी गई थी। वह एक रिसार्ट पर स्वागत विभाग की कर्मचारी थीं। हत्या में तीन आरोपियों को अदालत से उम्रकैद की सजा हो चुकी है। रिसार्ट भाजपा के एक नेता का था। भाजपा की खूब बदनामी भी हुई थी। बहराल इस मामले का जिन्न तीन साल बाद फिर बोतल से बाहर आ गया है। भाजपा के एक पूर्व विधायक और उनकी पत्नी होने का दावा करने वाली महिला उर्मिला की आडियो बातचीत ने इस मामले को गरम कर दिया है। इसमें भाजपा के एक दलित नेता और राष्ट्रीय महासचिव व सूबे के संगठन मंत्री के आचरण पर उंगली उठाई गई है। दोनों नेताओं ने इसे अपने चरित्र हनन का प्रयास बताया है। कांग्रेस को बैठे-बिठाए यह संवेदनशील मुद्दा मिल गया है। इस कांड की सीबीआइ जांच की मांग जोर पकड़ गई है। पूर्व मंत्री और भाजपा की कद्दावर महिला नेता विजया बड़थ्वाल ने भी मांग की है कि निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि सच्चाई सामने आए। भाजपा के कुछ नेताओं ने इस्तीफे भी दे दिए हैं। विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। इस मामले ने पहले ही भाजपा की किरकिरी करवाई थी। इस मुद्दे पर पूरे देश में आक्रोश फैला था और आम जनता कड़ी कार्रवाई की उम्मीद कर रही थी। मामले के नए मोड़ के बाद एक बार फिर से भाजपा को कई तर्क गढ़ने होंगे। उत्तराखंड की भाजपा सरकार कई मुद्दों के साथ अब इस पर भी घिरी है।

बंगाल में शिव और शक्ति

अवैध घुसपैठियों से लेकर मुसलिम तुष्टीकरण जैसे मुद्दों पर भाजपा ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को घेरने का दांव चला है। ऊपर से हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण शुरू करके भाजपा को नया मुद्दा दे दिया। कबीर तृणमूल कांग्रेस का प्रमुख मुसलिम चेहरा थे। ममता ने भाजपा के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए कबीर को पार्टी से निकाल दिया। इतना ही नहीं, उन्हें हिंदू वोट बैंक की भी पूरी चिंता है। पिछले चुनाव में उन्होंने भाजपा के ‘जय श्री राम’ नारे को काली मां के हथियार से परास्त किया था। इस बार उन्होंने जगन्नाथ मंदिर बनवाया है। पांच जनवरी को सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर की आधारशिला रखेंगी। उन्होंने कहा है कि वे ईद के कार्यक्रम में जाती हैं तो भाजपा को दिख जाता है, पर गुरुद्वारे में माथा टेकती हैं तो भाजपाई आंख बंद कर लेते हैं। इस बार ममता का पूरा ध्यान शिव और शक्ति की पूजा पर है, जिसकी संस्कृति बंगाल में गहरे तक पैठी है।