देश जी रहा है पांच मोर्चों पर उथल-पुथल से – पश्चिम बंगाल में राज्यपाल–सरकार टकराव, राजस्थान में BJP की कलह, दिल्ली का अनियंत्रित प्रदूषण, महाराष्ट्र का बदला चुनावी गणित और बिहार के नतीजों के बाद यूपी में अखिलेश की बढ़ती बेचैनी। हालात तेजी से बदल रहे हैं।

अप्रिय विवाद

राज्यपालों से विपक्ष की सरकारों का टकराव केंद्र में भाजपा की सरकार बनने यानी 2014 से लगातार चल रहा है। पर पश्चिम बंगाल में यह टकराव अप्रिय दौर में चला गया। जगदीप धनखड़ जब राज्यपाल थे तो ममता बनर्जी से उनकी अनबन ने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। कुलपतियों की नियुक्ति का मामला हो या विधेयकों को स्वीकृति ना देने का, धनखड़ चैन से नहीं बैठे। कानून-व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार पर वे लगातार हमलावर रहे। पश्चिम बंगाल सरकार और राज्यपाल के रिश्ते राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बने।

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उनके उपराष्ट्रपति बन जाने के बाद सीवी आनंद बोस जब कोलकाता के राजभवन में तैनात हुए तो तल्खी के माहौल में बदलाव की उम्मीद बंधी थी, लेकिन जल्दी ही इन उम्मीदों पर पानी फिर गया। यह बात अलग है कि बोस के साथ जंग निजी रूप ले चुकी है, संवैधानिक मुद्दों से लेना-देना नहीं। ऐसा अतीत में कभी नहीं दिखा कि राज्यपाल ने किसी सांसद के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया हो। तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी पर राज्यपाल बोस का ऐसा रवैया किसी भी दृष्टि से स्वस्थ परंपरा नहीं। बनर्जी ने बयान दिया था कि राजभवन में हथियार जमा किए जा रहे हैं। इससे पहले राजभवन की एक महिला कर्मचारी ने राज्यपाल पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था। ममता बनर्जी इस कर्मचारी के समर्थन में उतर गई थी।

वसुंधरा पर ठीकरा

अंता विधानसभा सीट के उपचुनाव की हार ने राजस्थान भाजपा में अंतरकलह को बढ़ा दिया है। यह सीट आम चुनाव में भाजपा ने जीती थी, पर उसके विधायक कंवरलाल मीणा को अदालत से सजा हो जाने के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया था और उपचुनाव की नौबत आई। उपचुनाव में भाजपा के मोरपाल सुमन को कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया ने धूल चटा दी। सात बार के विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने इस हार का ठीकरा वसुंधरा राजे के सिर फोड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्हें प्रचार के लिए नहीं बुलाया गया। और भी कई वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी की गई। जबकि पहली बार के विधायकों को अहमियत दी गई। सिंघवी की शिकायत है कि उन्हें मुख्यमंत्री की अंता की सभा की सूचना तक नहीं दी गई। सिंघवी ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र भी भेजा था। वसुंधरा खेमे की प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।

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बेअसर रहा तिहरा इंजन

दिल्ली और इससे सटे इलाकों में गुलाबी ठंड की दस्तक के साथ ही शुरू हुआ प्रदूषण का कहर हर दिन नए रिकार्ड बना रहा है। इसके साथ ही सरकारी एजंसियां ‘ग्रैप’ लगाकर सख्तियां भी बढ़ा रही हैं। सख्ती के बाद भी प्रदूषण पर पहरा बेअसर हो रहा है। प्रदूषण की हालत इतनी खराब है कि हर दिन लगातार लाल श्रेणी में वायु गुणवत्ता का स्तर दर्ज किया जा रहा है। केंद्र से लेकर दिल्ली तक और पड़ोसी राज्यों में भी एक ही इंजन की सरकारें हैं, जो इस प्रदूषण के हालात से निपटने में नाकाम साबित हो रहे हैं। हालात इतने बुरे हैं कि अधिकारी खुद इस बात को मान रहे हैं कि क्या करें, इस बार तो सारे इंजन एक साथ बंद हो गए। समस्या यह है कि आरोप-प्रत्यारोप भी किस पर करें?

दिलचस्प चुनाव

महाराष्ट्र का स्थानीय निकाय चुनाव हमेशा से दिलचस्प होता रहा है। देश की आर्थिक राजधानी के स्थानीय निकाय पर शासन किसका हो, यह बात अहम होती है। हमेशा की तरह इस बार भी चुनाव में कई रंग दिख रहे हैं। सूबे के कुछ स्थानीय निकायों के चुनाव दो दिसंबर को होंगे और बाकी अगले साल जनवरी में। पर, स्थानीय पार्टियां उससे पहले ही मराठा ध्रुवीकरण की कोशिश में जुट गई हैं। नतीजतन राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस को नुकसान का खतरा है। संभावना तो यह भी है कि अजित पवार और शरद पवार की राकांपा ही नहीं, शिंदे की शिवसेना भी एक साथ आ जाएं। ये तीनों पार्टियां मिलकर लड़ेंगी तो मराठा ध्रुवीकरण होगा क्योंकि तीनों के नेता मराठा हैं। उनके प्रभाव वाले इलाके में कांग्रेस और भाजपा को मुश्किल होगी।

इसी तरह के मराठा ध्रुवीकरण की कोशिश उद्धव ठाकरे भी जरूर करेंगे। उनका जोर अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से तालमेल पर ज्यादा है। मकसद मराठा मानुष और हिंदुत्व को जोड़ना है। पुरानी शिवसेना को जीवित करने की मंशा है। भाजपा तो इस समीकरण पर नजर रख ही रही है, शरद पवार और उद्धव की इस रणनीति से कांग्रेस खेमे में बेचैनी है। कांग्रेस को दोनों ने अकेला छोड़ दिया है। पर कांग्रेस के पास कोई रास्ता भी तो नहीं। खास कर बिहार चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस की राजनैतिक हैसियत पर हर जगह सवाल उठेंगे और महाराष्ट्र में तो पहले भी उठ चुके हैं।

बेचैनी अखिलेश की

बिहार के चुनावी नतीजे तेजस्वी यादव पर तो वज्रपात साबित हुए ही, पर इन नतीजों ने पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की नींद उड़ा दी है। जो लोकसभा चुनाव के बाद मान बैठे थे कि 2027 में सूबे में उन्हीं की सरकार बनेगी। अखिलेश का ‘पीडीए’ समीकरण बिहार में नाकाम हो गया। वहां राजद का एमवाइ समीकरण भी नहीं चला। मुसलमानों में ओवैसी ने सेंध लगा दी। अखिलेश को भी मुसलिम वोट बैंक का गुमान है। पर, आजम खान के साथ रिश्तों में बेगानापन और ओवैसी के सवालों का चक्रव्यूह अखिलेश के मुसलिम वोट बैंक को बिखराव की राह पर ले जा सकते हैं।

बीएसपी अलग नुकसान करेगी। कांग्रेस के साथ रिश्तों में भी अविश्वास ने दूरी बढ़ाई है। भाजपा ने बिहार में लालू के जंगल राज को बीस साल बाद भी मुद्दा बनाया—तो उत्तर प्रदेश में भी वह मुलायम राज की खराब कानून व्यवस्था का डर जरूर दिखाएगी। मुसलमानों के तुष्टीकरण का आरोप लगाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश तो उसका ब्रह्मास्त्र है ही। अखिलेश लोकसभा जैसा ‘पीडीए’ जनाधार फिर दिखा पाएंगे, इस पर अब संदेह होने लगा है।