भारतीय विदेश सचिव के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल के बयान का जवाब देते हुए चीन के सरकार की प्रवक्ता ने शक्सगाम घाटी पर अपने देश के दावे को सही ठहराया।

चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने सोमवार (12 जनवरी) को कहा,”चीन को पूरा अधिकार है कि वह अपनी जमीन पर कोई भी बुनियादी ढांचा निर्माण करे। चीन और पाकिस्तान ने 1960 में एक सीमा समझौता पर साइन किया था और दोनों देशों के बीच सीमा का निर्धारण किया था, जो संप्रभु देशों के रूप में चीन और पाकिस्तान का अधिकार है।”

विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

बीते शुक्रवार को विदेश मंत्रालय की मीडिया ब्रीफिंग के दौरान एक पत्रकार ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू और कश्मीर और शक्सगाम घाटी में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के तहत चीन के निर्माण के बारे में सवाल पूछा। इस पर रणधीर जयसवाल ने जवाब दिया, “शक्सगाम घाटी भारत का क्षेत्र है। हमने 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है। हम लगातार यह कहते आए हैं कि यह समझौता अवैध और अमान्य है। हम चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को भी मान्यता नहीं देते, जो भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है जिस पर पाकिस्तान का जबरन और अवैध कब्जा है।”

उन्होंने आगे कहा, “जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा हैं। यह बात पाकिस्तानी और चीनी अधिकारियों को कई बार स्पष्ट रूप से बताई जा चुकी है। शक्सगाम घाटी में जमीनी हकीकत को बदलने के प्रयासों के खिलाफ हमने चीनी पक्ष के साथ लगातार विरोध जताया है। हम अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार भी सुरक्षित रखते हैं।”

ऐसे में आइए जानते हैं कि पाकिस्तान और चीन के बीच 1963 का समझौता क्या था, जिस पर भारत सरकार उठाती रही है आपत्तियां?

शक्सगाम घाटी पर है अभी किसका कब्जा?

शाक्सगाम घाटी, हुंजा-गिलगित इलाके का हिस्सा है जिस पर अभी पाकिस्तान का कब्जा है। यह सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में है। 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले इस क्षेत्र की भूभाग और जलवायु परिस्थितियाँ इंसानी जिंदगी के लिए सही नहीं हैं। इसे ट्रांस काराकोरम क्षेत्र भी कहा जाता है। भारत इस पर अपना दावा करता है, जबकि पहले इस पर पाकिस्तान का नियंत्रण था।

पाकिस्तान ने वर्ष 1963 में इसे चीन को एक समझौते के तहत सौंप दिया। हालांकि चीन ने इससे पहले भी इस क्षेत्र में अपना दबदबा कायम करने की कोशिश की थी। पर भारत हमेशा से अक्साई चिन को जम्मू-कश्मीर का हिस्सा मानता रहा है, लेकिन 1950 के दशक में चीन ने इस क्षेत्र से होकर तिब्बत और शिनजियांग को जोड़ने वाला एक हाईवे बनाया। तब से चीन अक्साई चिन को अपने शिनजियांग प्रांत के होतान काउंटी का हिस्सा होने का दावा करता रहा है।

क्या है 1963 का चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता

1963 का यह समझौता ऐसे समय में हुआ जब चीन-पाकिस्तान के संबंध और भी मजबूत हो रहे थे। उस समय अमेरिका के साथ कोल्ड वॉर के दौरान पाकिस्तान का गठबंधन था, इस गठबंधन के बावजूद पाकिस्तान चीन के साथ भी अपने संबंध अच्छे बनाना चाहता था क्योंकि 1962 में ही चीन भारत के साथ युद्ध लड़ा था और वह भारत पर भारी पड़ा था।

सीआईए के पूर्व अधिकारी और विश्लेषक ब्रूस रीडेल ने द इंडियन एक्सप्रेस के लिए एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी द्वारा भारत और पाकिस्तान को वार्ता के लिए आमंत्रित करने पर जोर दिया था। हालांकि, वार्ता होने से पहले ही चीन-पाकिस्तान समझौते की घोषणा हो गई और इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने वह जमीन चीन को सौंप दी जिस पर भारत अपना दावा करता था।

हालांकि 1963 के समझौते के आर्टिकल-6 में कहा गया कि “दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर विवाद के निपटारे के बाद संबंधित देश इस समझौते के आर्टिकल दो में वर्णित सीमा पर चीन की सरकार के साथ फिर से बातचीत शुरू करेगा, ताकि वर्तमान समझौते के स्थान पर एक औपचारिक सीमा संधि पर हस्ताक्षर किए जा सकें।”

जवाहर लाल नेहरू भी उठा चुके आवाज

यह मामला तत्कालीन समय में भारतीय संसद में भी उठाया गया था। नेहरू आर्काइव्स के अनुसार प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 5 मार्च 1963 को कहा, “हम स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान के साथ समझौता करने के लिए उत्सुक हैं,” लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें लगता है कि चीन-पाकिस्तान समझौते की घोषणा “कश्मीर और अन्य संबंधित मामलों पर संयुक्त वार्ता के परिणाम को प्रभावित करने के लिए की गई थी।”

उन्होंने कहा, “हालांकि, पाकिस्तान के साथ सम्मानजनक और न्यायसंगत समझौते की हमारी प्रबल इच्छा के प्रतीक के रूप में, हम कलकत्ता में बातचीत जारी रखने का प्रस्ताव रखते हैं। मैंने यह भी कहा है कि समझौते का अर्थ यह नहीं है कि हम पाकिस्तान के हर बात को चाहे वह सही हो या गलत, स्वीकार कर लें। हम उन सिद्धांतों को नहीं छोड़ सकते जिन्हें हमने हमेशा महत्व दिया है।”

चीन के बारे में पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा, “समझौते का दूसरा पक्ष यानी चीन, कश्मीर विवाद में कभी हस्तक्षेप न करने के अपने दावों या सीमा वार्ता के बारे में अपने बेतुके दावे के बावजूद कि इससे चीनी और पाकिस्तानी लोगों के बीच मित्रता बढ़ी है और यह एशिया और विश्व शांति के हित में है, वह भारत-पाकिस्तान संबंधों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर रहा है।”

ऐसा करके चीन कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों का फायदा उठाकर अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाना चाहता है। भारत सरकार ने इस समझौते के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट कर दिया है और चीन की सरकार के सामने विरोध दर्ज कराया है।

ब्रूस रीडेल ने आगे लिखा, “पाकिस्तान और चीन के बीच हुए समझौते से भारत को विश्वासघात का एहसास होने के बावजूद कश्मीर वार्ता पाकिस्तान और भारत के बीच बारी-बारी से छह सत्रों तक चली। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने दोनों नेताओं को एक से अधिक बार पत्र लिखकर समझौता करने के लिए राजी करने की कोशिश की। जब पाकिस्तान ने क्षेत्रीय समझौते के लिए अपनी मांगें रखीं तो यह वार्ता सफल नहीं हो सकी।”

2022 में तत्कालीन विदेश मंत्रालय के राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन ने लोकसभा में इस मुद्दे पर सरकार के रुख से संबंधित एक प्रश्न का उत्तर दिया। उन्होंने कहा, “चीन पिछले छह दशकों से लद्दाख के लगभग 38000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अवैध रूप से कब्जा किए हुए है। इसके अलावा, 1963 में तथाकथित चीन-पाकिस्तान ‘सीमा समझौते’ के तहत पाकिस्तान ने लद्दाख में पाकिस्तान के अवैध रूप से कब्जा किए गए इलाकों से शक्सगाम घाटी में 5180 वर्ग किमी भारतीय क्षेत्र को अवैध रूप से चीन को सौंप दिया।”

उन्होंने आगे कहा, “भारत ने 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान ‘सीमा समझौते’ को कभी मान्यता नहीं दी है और लगातार यह कहा है कि यह अवैध और अमान्य है। यह तथ्य कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। पाकिस्तानी और चीनी अधिकारियों को कई बार स्पष्ट रूप से बताया जा चुका है।”

चीन से CPEC का भी मामला

2015 में शुरू हुई चीन की महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट, सीपीईसी के पास होने के कारण शक्सगाम का महत्व फिर से बढ़ गया है। चीन की ओर से बनाई जा रही इस प्रोजेक्ट (CPEC) का उद्देश्य पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को शिनजियांग के चीनी शहर काशगर से जोड़ना था। चीन के लिए यह मलक्का जलडमरूमध्य मार्ग की तुलना में मध्य पूर्व से तेल आयात का एक वैकल्पिक तरीका होगा।

इसके अतिरिक्त, सीपीईसी रूट पर कोयला प्लांट्स से लेकर हाईवे तक की प्रोजेक्ट की योजना बनाई गई थी, जिसमें चीन का कुल निवेश 62 मिलियन डॉलर से अधिक था। हालांकि, इस प्रोजेक्ट की प्रगति धीमी रही है, क्योंकि इसमें बलूच आतंकवादियों ने प्रोजेक्ट पर हमले से लेकर पाकिस्तान की व्यापक आर्थिक समस्याओं समेत कई मुद्दे शामिल हैं।

हालांकि भारत लगातार सीपीईसी का विरोध करता रहा है, यह तर्क देता रहा है कि इसका मार्ग पीओके से होकर गुजरता है, जो “पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जा किया गया भारत का क्षेत्र” है। भारत ने इस परियोजना की आलोचना करते हुए कहा है कि यह उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करती है।

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