महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई हमेशा से एक अलग किस्म की राजनीति के लिए जानी जाती है। महाराष्ट्र के अपने मुद्दे हो सकते हैं, लेकिन राजनीति के लिहाज़ से मुंबई हमेशा केंद्र में रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह साफ है- राज्य में चाहे किसी की भी सरकार रही हो, मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर पिछले तीन दशकों से शिवसेना का दबदबा रहा है। पिछले 40 सालों में सबसे ज्यादा बार शहर का मेयर शिवसेना का ही रहा है।

हालांकि, इस बार का बीएमसी चुनाव पिछले चुनावों से बिल्कुल अलग हैं। शिवसेना अब दो धड़ों में बंट चुकी है। एकनाथ शिंदे पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह हासिल कर चुके हैं, पार्टी के संस्थापक बालासाहब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे पिता की विरासत को आगे बढ़ाने के दावे के साथ खुद को शिवसेना को असली उत्तराधिकारी बता रहे हैं। दोनों ही गुट मराठी अस्मिता की राजनीति को अपना सबसे बड़ा हथियार मानते हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बीएमसी चुनाव ठाकरे परिवार के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। वजह यह है कि यह सिर्फ नगर निगम का चुनाव नहीं, बल्कि इससे यह भी तय होगा कि बालासाहब ठाकरे की राजनीतिक विरासत को आगे कौन बढ़ाएगा। अब तक बीएमसी चुनावों में शिवसेना को बालासाहब ठाकरे के नाम और मराठी अस्मिता के मुद्दे पर ही समर्थन मिलता रहा है। लेकिन इस बार मराठी अस्मिता का नेतृत्व दोनों धड़े—उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे करते नजर आएंगे।

आइए देखते हैं कि आखिर बालासाहब ठाकरे ने मुंबई और बीएमसी की राजनीति में शिवसेना को कैसे स्थापित किया।

बालासाहब ठाकरे का उदय

बालासाहब ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1927 को हुआ था। शुरुआत से ही वह एक बेहतरीन कार्टूनिस्ट और तेज़तर्रार पत्रकार थे। समाज और राजनीति को गहराई से समझने की उनकी क्षमता ही आगे चलकर उनकी राजनीति की नींव बनी।

बालासाहब ठाकरे की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत उनके साप्ताहिक पत्र ‘मार्मिक’ से हुई। 13 अगस्त 1960 को ‘मार्मिक’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ, जिसका उद्घाटन उस समय के मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण ने किया था। अपने शुरुआती लेखों में ही बालासाहब ने उन मुद्दों को उठाया, जो आगे चलकर शिवसेना की राजनीति का आधार बने।

1961 में ‘मार्मिक’ के जरिए बालासाहब ठाकरे ने मुंबई में बाहर से आकर रहने वाले प्रवासियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने लिखा कि महाराष्ट्र सरकार फैक्ट्रियों को जमीन, बिजली और पानी जैसी सभी सुविधाएं देती है, लेकिन फैक्ट्रियों में काम करने के लिए मजदूर बाहर से लाए जाते हैं। सवाल उठाया गया कि जब स्थानीय मराठी युवा नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो बाहर से आए लोगों को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है। इस मुद्दे को बालासाहब ने महाराष्ट्र और मराठी अस्मिता से जोड़ दिया।

इसके बाद ‘मार्मिक’ में गैर-महाराष्ट्रीयन मुद्दों पर खुलकर लिखा जाने लगा। सरकारी अस्पतालों, डॉक्टरों और नौकरियों में बाहरी लोगों की मौजूदगी को लेकर बाकायदा सूचियां तक प्रकाशित की गईं।

5 जून 1966 को ‘मार्मिक’ के एक अंक में बालासाहब ठाकरे ने ऐलान किया कि वे शिवसेना शुरू करने जा रहे हैं। इसके बाद 19 जून 1966 को शिवसेना का औपचारिक गठन हुआ। 30 अक्टूबर 1966 को दादर के शिवाजी पार्क में शिवसेना की पहली बड़ी रैली आयोजित की गई। बालासाहब ने ‘मार्मिक’ में लिखा कि सभी स्वाभिमानी मराठियों को अपने सम्मान की रक्षा के लिए इस रैली में जरूर आना चाहिए।

धीरे-धीरे ‘मार्मिक’ शिवसेना का मुखपत्र बन गया। बालासाहब ठाकरे इस बात का खास ध्यान रखते थे कि पत्रिका में वही लिखा जाए, जो शिवसेना की विचारधारा और कार्यकर्ताओं की भावना के अनुरूप हो।

बीएमसी में शिवसेना की एंट्री

इसके बाद 1968 में बीएमसी के चुनाव हुए। यह शिवसेना की लोकप्रियता की पहली बड़ी परीक्षा थी। शिवसेना ने 42 सीटें जीतीं और प्रजा समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया, जिसे 11 सीटें मिलीं। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला। आरोप-प्रत्यारोप के बाद शिवसेना और प्रजा समाजवादी पार्टी के रास्ते अलग हो गए।

इसके बाद बालासाहब ठाकरे ने शिवसेना की राजनीति का और विस्तार किया। अब तक पार्टी मराठी अस्मिता और प्रवासियों के मुद्दे पर केंद्रित थी, लेकिन 12 अप्रैल 1982 को मुंबई के मिल मजदूर आंदोलन के साथ शिवसेना ने श्रमिक राजनीति में भी दखल दिया। इसी दौर में बालासाहब ठाकरे ने हिंदुत्व के मुद्दे पर खुलकर बोलना शुरू किया।

एक उपचुनाव में शिवसेना ने रमेश प्रभु को प्रत्याशी बनाया। बालासाहब ठाकरे ने तब कहा था कि सिर्फ शिवसेना ही हिंदुओं की रक्षा कर सकती है। यही वह दौर था जब ‘मार्मिक’ के साथ-साथ ‘सामना’ अख़बार की शुरुआत हुई। बालासाहब ने साफ कहा कि ‘सामना’ हिंदुत्व की राजनीति का एक सशक्त हथियार बनेगा और शिवसेना को बदनाम करने वालों को करारा जवाब देगा।

बीएमसी में शिवसेना का प्रदर्शन

इस तरह बालासाहब ठाकरे की राजनीति दो बड़े मुद्दों पर टिकी-एक तरफ मराठी अस्मिता और स्थानीय अधिकार तो दूसरी तरफ हिंदुत्व, जिसने शिवसेना को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। बीएमसी चुनावों के नतीजे इस बात के गवाह हैं कि मुद्दों की राजनीति ने शिवसेना को मुंबई की सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति बना दिया। नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है कि 1992 से 2017 तक बीएमसी चुनावों में शिवसेना का प्रदर्शन कितना मजबूत रहा, और कैसे समय के साथ कांग्रेस का ग्राफ गिरता गया, जबकि बीजेपी का प्रभाव बढ़ता गया।

वर्षकुल सीटेंशिवसेनाBJPकांग्रेसNCPMNSSP
19922217014111
1997221103264921
20022279835611210
20072278428711478
201222775315213289
201722784823197

अब शिवसेना की ताकत को इसी बात से समझा जा सकता है कि उसने बीएमसी को अब तक 6 मेयर दिए हैं। इस ट्रेंड के मायने ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि 1968 से पहले तक मुंबई महानगरपालिका पर भी कांग्रेस का राज था, ऐसे में उसकी सत्ता को उखाड़ फेंक ही शिवसेना ने मायनगरी को अपना राजनीतिक गढ़ बनाया। नीचे दी गई टेबल से समझें कि शिवसेना ने बीएमसी को अब तक कौन-कौन से मेयर दिए हैं-

मेयर का नामकार्यकाल
मिलिंद वैद्य1996 – 1997
शुभा राऊल2007 – 2009
सुनील प्रभुमार्च 2012 – सितंबर 2014
स्नेहल अंबेकरसितंबर 2014 – मार्च 2017
विश्वनाथ पी. महादेश्वरमार्च 2017 – नवंबर 2019
किशोरी पेडणेकरनवंबर 2019 – मार्च 2022

बीएमसी में क्यों मजबूत है ठाकरे फैक्टर?

इतने सालों बाद भी अगर बीएमसी में ठाकरे ब्रांड को भरोसेमंद माना जाता है, तो उसका सबसे बड़ा कारण मराठी अस्मिता है। चाहे बात उद्धव ठाकरे की हो या फिर राज ठाकरे की, मराठी अस्मिता की राजनीति को लेकर सबसे मुखर नेता यही दोनों रहे हैं। बीते कई दशकों में शिवसेना ने खुद को मराठी हितों की असली पार्टी के रूप में स्थापित किया है।

मुंबई में शिवसेना के मजबूत बने रहने का एक बड़ा कारण उसका निचले मध्यम वर्ग और झुग्गी-बस्तियों में गहरा प्रभाव रहा है। पिछले कई दशकों में शिवसेना ने ऐसा सामाजिक नेटवर्क खड़ा किया है, जिसकी वजह से कई लोगों ने उसे अपने परिवार का हिस्सा मानना शुरू कर दिया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आरएसएस की शाखाएं मुख्य रूप से विचारधारा तक सीमित रहती हैं, जबकि शिवसेना की शाखाएं पिछले कई वर्षों से ज़मीनी स्तर पर एक सामाजिक केंद्र की तरह काम करती रही हैं। यहां लोगों के स्थानीय झगड़े, पारिवारिक विवाद, आर्थिक परेशानियां और यहां तक कि कानूनी समस्याएं सुलझाने में भी मदद की जाती है।

इसी वजह से शिवसेना के प्रति लोगों के बीच अपनापन और भरोसा बना। यही कारण माना जाता है कि अब तक कोई दूसरी पार्टी बीएमसी में शिवसेना को पूरी तरह चुनौती नहीं दे पाई।

इस बार के बीएमसी चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती यही रहने वाली है कि मराठी अस्मिता का यह भरोसा किस ओर जाता है-क्या यह एकनाथ शिंदे के गुट की तरफ शिफ्ट होता है, या फिर बालासाहब ठाकरे के उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे इस राजनीतिक विरासत को अपने पास बनाए रखने में सफल रहते हैं।

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