भारत में महिलाओं की सेहत से जुड़ी कई समस्याएं हैं, लेकिन एनीमिया (खून की कमी) ऐसी बीमारी है जो सबसे ज्यादा होने के बावजूद अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर को कमजोर बनाती है और जब तक इसके लक्षण साफतौर पर सामने आते हैं, तब तक शरीर काफी नुकसान झेल चुका होता है। यही कारण है कि एनीमिया को साइलेंट बीमारी भी कहा जाता है। हालात इतने गंभीर हैं कि देश की आधी से ज्यादा महिलाएं किसी न किसी स्तर पर एनीमिया से प्रभावित हैं। हाल ही में यूरोपियन जर्नल ऑफ कार्डियोवैस्कुलर मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी ने इस समस्या की गंभीरता को और उजागर कर दिया है।
क्या कहती है ताजा स्टडी?
इस रिसर्च के अनुसार ग्रामीण भारत में 62.5 प्रतिशत किशोरियां एनीमिया से पीड़ित पाई गईं। इनमें से करीब 40 प्रतिशत को हल्का, 18 प्रतिशत को मध्यम और 4.5 प्रतिशत को गंभीर एनीमिया था। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि एनीमिया अब सिर्फ गर्भवती महिलाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किशोरियों और युवा महिलाओं में भी तेजी से फैल रहा है।
एनीमिया क्या है?
एनीमिया तब होता है जब शरीर में हीमोग्लोबिन या रेड ब्लड सेल्स की मात्रा सामान्य से कम हो जाती है। हीमोग्लोबिन का मुख्य काम शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन पहुंचाना होता है। जब हीमोग्लोबिन कम हो जाता है, तो शरीर के अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इसका असर धीरे-धीरे पूरे शरीर पर पड़ता है और व्यक्ति कमजोर, थका हुआ और बीमार महसूस करने लगता है।
भारत में एनीमिया के मुख्य कारण
भारत में महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण आयरन की कमी है। इसके अलावा फोलिक एसिड और विटामिन B12 की कमी भी एनीमिया को बढ़ाती है। बार-बार गर्भधारण, बहुत ज्यादा पीरियड्स के दौरान खून बहना और संतुलित आहार की कमी भी इसके बड़े कारण हैं। कई बार महिलाएं पौष्टिक खाना जानबूझकर या मजबूरी में कम खाती हैं, जिससे शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते।
महिलाओं में एनीमिया ज्यादा क्यों होता है?
महिलाओं में एनीमिया ज्यादा होने के पीछे जैविक और सामाजिक दोनों तरह के कारण हैं। मासिक धर्म के दौरान हर महीने खून की हानि होती है। गर्भावस्था और स्तनपान के समय शरीर को ज्यादा आयरन और पोषक तत्वों की जरूरत होती है, लेकिन अक्सर यह जरूरत पूरी नहीं हो पाती। इसके अलावा समाज में आज भी कई घरों में महिलाएं सबसे आखिर में खाना खाती हैं, जिससे उन्हें पर्याप्त और पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाता। यही आदतें उन्हें एनीमिया के खतरे में डाल देती हैं।
किशोरियों के लिए क्यों है यह खतरे की घंटी?
किशोरावस्था में शरीर तेजी से बढ़ता है। इस समय खून बनाने की जरूरत भी ज्यादा होती है। लेकिन सही खानपान न मिलने के कारण शरीर उतना खून नहीं बना पाता, जितनी जरूरत होती है। स्कूल जाने वाली कई किशोरियां जंक फूड ज्यादा खाती हैं और हरी सब्जियां, दालें और फल कम। इसका नतीजा यह होता है कि छोटी उम्र में ही वे एनीमिया की शिकार हो जाती हैं।
एनीमिया के लक्षण
एनीमिया के शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। थकान महसूस होना, चक्कर आना, सांस फूलना, चेहरे और आंखों का पीला पड़ना, हाथ-पैर ठंडे रहना और ध्यान लगाने में परेशानी इसके आम लक्षण हैं। गंभीर स्थिति में दिल की धड़कन तेज होना और बेहोशी तक हो सकती है।
एनीमिया से कैसे बचा जा सकता है?
एनीमिया से बचाव के लिए संतुलित और पोषक आहार सबसे जरूरी है। आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, चुकंदर, गुड़, दालें, अनार और सेब को रोज के खाने में शामिल करना चाहिए। विटामिन C आयरन को शरीर में अच्छे से अवशोषित करने में मदद करता है, इसलिए नींबू, संतरा और आंवला भी खाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां भी ली जा सकती हैं।
निष्कर्ष
समय रहते इसकी पहचान और सही इलाज बेहद जरूरी है। जागरूकता, सही खानपान और नियमित जांच से इस साइलेंट बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। अगर आज ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।
डिस्क्लेमर
यह स्टोरी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या डाइट में परिवर्तन करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य हेल्थ एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
