जिंदगी की मसरूफियत, घर और ऑफिस की जिम्मेदारियां,आर्थिक तंगी, बीमारी का तनाव, रिश्तों का तनाव दिमाग को सोचने पर मजबूर कर देता। जितनी बड़ी परेशानी सोच भी उतनी ही ज्यादा। कुछ लोग ऐसे हैं जिन पर तनाव जल्दी हावी हो जाता है और वो लगातार एक ही बात को बार-बार सोचते रहते हैं। उनकी सोच आसमान के जितनी ऊंची हो जाती है कि उसका कोई अंत ही नहीं दिखता। आप जानते हैं कि सोचने की इस आदत को मेडिकल भाषा में ओवरथिंकिंग कहते हैं। ज्यादा सोचने की ये आदत आपकी सेहत को घुन की तरह खा रही है। ज्यादा सोचना शरीर में ‘कोर्टिसोल’ (Stress Hormone) हॉर्मोन को बढ़ाता है। यह हार्मोन पाचन खराब करता है, नींद छीन लेता है और धीरे-धीरे हार्ट हेल्थ को भी प्रभावित करता है।
ओवरथिंकिंग (Overthinking) पर आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान (Psychology) ने पिछले कुछ वर्षों में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिसर्च बताती है कि यह केवल एक आदत नहीं है, बल्कि हमारे दिमाग के काम करने के तरीके में आया एक गंभीर बदलाव है। नफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) के शोधकर्ताओं के मुताबिक जब हम बहुत ज्यादा सोचते हैं, तो हमारे दिमाग का Cerebellum जो रचनात्मकता के लिए जिम्मेदार है सुस्त पड़ जाता है। ओवरथिंकिंग हमारी प्रॉब्लम सॉल्विंग क्षमता को खत्म कर देती है।
यानी आप जितना ज्यादा सोचते हैं, सही फैसला लेने की क्षमता उतनी ही कम हो जाती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले (UC Berkeley) के मुताबिक ओवरथिंकिंग रात में ग्लीम्फैटिक सिस्टम(Glymphatic System) को प्रभावित करती है। सोते समय हमारा दिमाग जहरीले तत्वों (Toxins) को साफ करता है। ओवरथिंकिंग के कारण जब नींद पूरी नहीं होती तो ये टॉक्सिन्स दिमाग में जमा होने लगते हैं, जिससे अगले दिन आपका मूड और भी ज्यादा चिड़चिड़ापन हो जाता है और नकारात्मक सोच पैदा होती है।
इस आदत को ठीक करना संभव है, बशर्ते समय रहते आदतों में बदलाव किया जाए। भारतीय योग गुरु, लेखक, शोधकर्ता और टीवी पर्सनालिटी डॉक्टर हंसा योगेंद्र (Hansa Yogendra) के मुताबिक ओवरथिंकिंग कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक मेंटल पैटर्न है जिसे ट्रेन किया जा सकता है। सबसे पहले अपनी सोच को पहचानना जरूरी है। जब बार-बार वही विचार आने लगें, तो खुद से सवाल करें, क्या ये समस्या इस वक्त मेरे कंट्रोल में है? अगर नहीं तो उस परेशानी पर सोचने से खुद को रोकें। अब सवाल ये उठता है कि आखिर ये ओवर थिंकिंग की आदत क्यों होती है और इसे कैसे कंट्रोल किया जा सकता है।
ओवर थिंकिंग की आदत क्यों होती है?
ओवर थिंकिंग की आदत के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जैसे बॉडी की एक्टिविटी में कमी होना, नींद की कमी होना, मोबाइल और लैपटॉप पर ज्यादा समय गुजारना, कैफीन का ज्यादा सेवन करना ओवर थिंकिंग को बढ़ा देता है। अगर तनाव लंबे समय तक बना रहे तो काउंसलर या मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से बात करना सबसे समझदारी भरा कदम माना जाता है।
ओवरथिंकिंग पर ब्रेक लगाना क्यों जरूरी
लगातार एक ही बात पर सोचते रहना दिमाग को थका देता है और शरीर में स्ट्रेस हार्मोन बढ़ाता है। ओवरथिंकिंग से नींद खराब होती है, बेचैनी बढ़ती है और धीरे-धीरे एंग्जायटी का रूप ले सकती है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि दिमाग को बार-बार नेगेटिव सोच में उलझाए रखना दिल और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है इसलिए समय रहते इस आदत पर कंट्रोल करना जरूरी है।
ओवर थिंकिंग को कैसे कंट्रोल करें
सांस पर ध्यान दें
एंग्जायटी और घबराहट के समय सांस पर ध्यान देना सबसे असरदार तरीका माना जाता है। गहरी और धीमी सांस लेने से नर्वस सिस्टम शांत होता है और दिमाग को संकेत मिलता है कि खतरा नहीं है। रोज कुछ मिनट डीप ब्रीदिंग या प्राणायाम करने से दिल की धड़कन नॉर्मल रहती है, बेचैनी कम होती है और ओवरथिंकिंग की चेन टूटने लगती है।
माइंडफुलनेस और मेडिटेशन
मेडिटेशन और माइंडफुलनेस दिमाग को वर्तमान में टिकाए रखने में मदद करती हैं। जब व्यक्ति बार-बार भविष्य या बीती बातों में उलझता है तब एंग्जायटी बढ़ती है। रोजाना कुछ समय शांत बैठकर ध्यान करने से विचारों की गति धीमी होती है और मानसिक संतुलन बेहतर होता है। इससे स्ट्रेस कम होता है और दिमाग पर कंट्रोल बढ़ता है।
डिजिटल डिटॉक्स क्यों जरूरी
लगातार मोबाइल, सोशल मीडिया और स्क्रीन पर बने रहना ओवरथिंकिंग और एंग्जायटी को बढ़ा सकता है। नकारात्मक खबरें और तुलना करने वाला कंटेंट दिमाग पर दबाव डालता है। एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि दिन में कुछ समय फोन से दूरी बनाएं, खासकर सोने से पहले। डिजिटल ब्रेक लेने से नींद बेहतर होती है और दिमाग को आराम मिलता है।
रूटीन और फिजिकल एक्टिविटी
अनियमित दिनचर्या भी मानसिक बेचैनी को बढ़ाता है। तय समय पर सोना-जागना, खाना और हल्की-फुल्की फिजिकल एक्टिविटी दिमाग को स्थिरता देती है। वॉक, योग या हल्की एक्सरसाइज से शरीर में एंडोर्फिन रिलीज होता है, जो मूड को बेहतर बनाता है। इससे एंग्जायटी कम होती है और ओवरथिंकिंग पर काबू पाना आसान होता है।
भावनाओं को दबाने के बजाय व्यक्त करें
कई बार लोग अपनी चिंता और डर को भीतर ही दबाए रखते हैं, जिससे एंग्जायटी बढ़ती जाती है। भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना, अपनी फीलिंग्स शेयर करना या लिखकर व्यक्त करना मानसिक बोझ को हल्का करता है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भावनाओं को बाहर निकालना दिमाग को रिलैक्स करता है और ओवर थिंकिंग के चक्र को तोड़ने में मदद करता है। रोज़ाना डीप ब्रीदिंग, मेडिटेशन और माइंडफुलनेस दिमाग को वर्तमान में लाने में मदद करती है और कोर्टिसोल लेवल को कम करती है।
निष्कर्ष
ओवरथिंकिंग सिर्फ एक मानसिक आदत नहीं, बल्कि सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली स्थिति बन सकती है। लगातार तनाव और ज्यादा सोचने से शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जो पाचन, नींद और दिल की सेहत को धीरे-धीरे प्रभावित करता है। अगर समय रहते इस आदत पर ध्यान न दिया जाए, तो यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकती है।
डिस्क्लेमर
यह स्टोरी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या डाइट में परिवर्तन करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
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