खनन मंत्रालय (Mines Ministry) ने गुरुवार को बताया कि जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) के रियासी जिले में लिथियम (lithium) का बहुत बड़ा भंडार पाया गया है। ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि जम्मू-कश्मीर में लिथियम का 59 लाख टन का विशाल भंडार मिलने के बाद भारत की ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना जैसे देशों पर निर्भरता कम होगी।

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लिथियम एक खनिज है

लिथियम एक तरह का खनिज है। इसे लकड़ी से भी हल्का धातु माना जाता है। लिथियम (Why is lithium so important?) का इस्तेमाल मोबाइल फोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक व्हीकल की बैटरी बनाने के लिए किया जाता है। रिचार्जेबल बैटरी का सबसे महत्वपूर्ण कम्पोनेंट लिथियम होता है, इसलिए ऐसा माना जाता है कि लिथियम भविष्य में प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन की समस्या से निपटने में कारगर साबित होगा। हालांकि इस बात बहुत कम रेखांकित किया जाता है कि लिथियम से कितना प्रदूषण फैलता है।

लिथियम से प्रदूषण

लिथियम को ग्रीन एनर्जी के स्रोतों में से एक माना जाता है। माइनिंग के काम से जुड़ी बड़ी-बड़ी कंपनियां अचानक पर्यावरण बचाने की बात करने लगी हैं। ऐसी कंपनियां लगातार लोगों से पेट्रोल-डीजल के विकल्प में ग्रीन एनर्जी को चुनने का आग्रह कर रही हैं।

सरकारें भी लगातार इस ओर प्रयास कर रही हैं। अनुमान है कि भारत में साल 2030 तक इलेक्ट्रिक गाड़ियों के निर्माण में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है।

ऐसे में यह जानना आवश्यक हो जाता है कि जिस लिथियम के भरोसे ग्रीन भविष्य के सपने बेचे जा रहे हैं, उसका उत्पादन कितना ग्रीन है?

इस बात में कहीं कोई विवाद नहीं है कि किसी प्रकार का खनन पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है। वह पानी, मिट्टी, हवा को प्रदूषित करता है। पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। लेकिन कोयला या दूसरे जीवाश्म ईंधनों की खनन के तुलना में लिथियम के खनन को इसलिए फायदेमंद बताया जाता क्योंकि यह नवीकरणीय ऊर्जा की श्रेणी में आता है।

यानी एक बार अगर लिथियम को निकालकर बैटरी बना लिया गया, तो उसे बार-बार चार्ज कर इस्तेमाल किया जा सकता है। जबकि इस तथ्य का जिक्र करते हुए यह याद रखना जरूरत है कि बैटरी को चार्ज करने के लिए बिजली की जरूरत पड़ती है। और बिजली को बनाने के लिए कई तरह के संसाधन लगते हैं।

जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में लिथियम पत्थर के साथ ग्रामीण। (PTI Photo)

1 टन लिथियम = 2.2 मिलियन लीटर पानी

फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ (FoE) की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक टन लिथियम के उत्पादन के लिए लगभग 2.2 मिलियन लीटर पानी की आवश्यकता होती है। दुनिया के जिस देश ‘चिली’ में लिथियम का सबसे बड़ा भंडार है, वहां लिथियम खनन की वजह पानी के लिए संघर्ष शुरू हो चुका है।

NRDC (Natural Resources Defense Council) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चिली में लिथियम खनन की वजह से कई मूलनिवासी समुदायों को विस्थापित होना पड़ गया है। NRDC ने खनन से प्रभावित कई लोगों को बयान भी छापा है। स्थानीय निवासी रिवेरा कहती हैं, “हमारे पास पहले एक नदी हुआ करती थी जो अब नहीं है। पानी की एक बूंद भी नहीं है। और न केवल यहां कोपियापो में बल्कि पूरे चिली में, ऐसी नदियां और झीलें हैं जो गायब हो गई हैं।”

चिली के अलावा पुर्तगाल में भी लिथियम खनन विवादास्पद हो गया है। पुर्तगाली निवासी भारी पर्यावरणीय प्रभाव का हवाला देते हुए लिथियम खनन के खिलाफ रैली निकाल चुके हैं। अब दुनिया के सामने यह सवाल प्रकट रूप से खड़ा है कि उसे पानी चाहिए या लिथियम?

भारत में जल संकट

जम्मू-कश्मीर में लिथियम का भंडार मिलने के बाद से तमाम तरह की उम्मीदों को पंख लगाए जा रहे हैं। हालांकि लिथियम के उत्पादन के लिए जिस भारी जल भंडार की जरूरत है, भारत उससे जूझ रहा है। भारत सरकार की एजेंसी नीति आयोग ने साल 2019 में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि वर्ष 2030 तक करीब 40 फीसदी भारतीयों के पास पीने के लिए पर्याप्त पानी नहीं होगा।

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First published on: 14-02-2023 at 17:20 IST