राजेश खन्ना, जिन्हें उनके दौर का सबसे बड़ा सुपरस्टार माना जाता है, जब किस्मत उनके साथ थी तो वह अपने समय के राजा थे। उनकी “मिडास टच” ऐसी थी कि उनकी हर फिल्म हिट हो जाती थी और हर हिट फिल्म के साथ उनकी लोकप्रियता और बढ़ती चली जाती थी। लेकिन यह सुनहरा दौर ज़्यादा समय तक नहीं चला। जब यह दौर खत्म हुआ तो काका शोहरत के उस आसमान से नीचे आ गए। इसके बाद वह उसी पुराने स्टारडम को दोबारा पाने की कोशिश करते रहे और जीवन भर उसी ऊंचाई को फिर से छूने की चाह रखते रहे।

राजेश खन्ना ने सिर्फ तीन साल में लगातार 17 हिट फिल्में दी थीं, मगर कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘जंजीर’ के आने के साथ ही उनका वो दौर खत्म हो गया। दोनों ने ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘नमक हराम’ में साथ काम किया था। ‘जंजीर’ के बाद भी राजेश खन्ना की ‘आप की कसम’ और ‘रोटी’ जैसी फिल्में हिट रहीं, लेकिन यह सफलता ज्यादा दिन नहीं चली। 1975 में अमिताभ बच्चन की ‘शोले’ और ‘दीवार’ जैसी बड़ी हिट फिल्मों के आने के बाद राजेश खन्ना पूरी तरह सुपरस्टार की कुर्सी से उतर गए। उस साल उनकी सिर्फ एक फिल्म आई, जो अमिताभ की लोकप्रियता की लहर में कहीं खो गई।

उस दशक के बाकी सालों में उनकी कुछ ही फिल्में हिट रहीं, जैसे मेहबूबा और अनुरोध, लेकिन ऐसी सफलताएं बहुत कम और बीच-बीच में ही मिलीं। दर्शक अब राजेश खन्ना के अंदाज से आगे बढ़ चुके थे। हालात और खराब होते गए क्योंकि राजेश खन्ना नए तरह के किरदार करने को तैयार नहीं थे। उनकी करीबी सह-कलाकार शर्मिला टैगोर ने गौतम चिंतामणि की किताब Dark Star: The Loneliness of Being Rajesh Khanna में कहा, “काका या तो खुद को नए दौर के हिसाब से बदल नहीं पाए, या बदलना ही नहीं चाहते थे। हालत यह हो गई कि वह मजाक बनते चले गए और लोग उन्हें चिढ़ाने लगे।”

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नए दौर के साथ नए नियम भी आ गए थे। जो फिल्मकार कभी उन पर जान छिड़कते थे वही लोग उनकी गैर-पेशेवर हरकतों की बातें करने लगे। यश चोपड़ा, जिन्होंने राजेश खन्ना के सहयोग से ही अपना बैनर शुरू किया था,मगर उन्हें लगने लगा था कि वह उनके सुपरस्टार नखरों को और नहीं झेल सकते। इसके अलावा, उनकी ज्यादा शराब पीने की आदत भी एक बड़ी समस्या बनती जा रही थी। वह देर रात तक शराब पीते रहते थे और फिर उम्मीद करते थे कि उनके आसपास मौजूद चमचों की पूरी फौज उनकी हर जरूरत का ख्याल रखे।

1980 का दशक बस आने ही वाला था और इसे हिंदी सिनेमा का सबसे खराब दौर माना जाता है। इस दौर ने राजेश खन्ना को और भी ज्यादा झकझोर दिया। यह बात सबको पता थी कि डिंपल कपाड़िया के साथ उनकी शादी टूटने की कगार पर थी और उनका करियर भी लगातार गिर रहा था। डिंपल उनकी हालत को लेकर साफ तौर पर चिंतित थीं।

1985 में इंडिया टुडे से बातचीत में उन्होंने राजेश खन्ना की हालत को बेहद दयनीय बताया और कहा,“जब कोई कामयाब आदमी पूरी तरह टूट जाता है, तो उसकी झुंझलाहट आसपास के पूरे माहौल को अपनी चपेट में ले लेती है। यह बहुत ही दुखद होता था जब राजेश हफ्ते के आखिर में फिल्म की कमाई के आंकड़ों का इंतजार करते थे, लेकिन लोग उन्हें सच बताने की हिम्मत ही नहीं कर पाते थे।”

लगातार फ्लॉप फिल्मों के कारण उनका आत्मविश्वास बुरी तरह हिल गया था। ऐसे में राजेश खन्ना ने मोहन कुमार की फिल्म ‘अवतार’ में काम करने के लिए हां की। उनकी हैरानी के लिए यह फिल्म हिट साबित हुई। इसे 1980 के दशक की बागबान भी कहा जाता है। इस फिल्म में उन्होंने सफेद बालों वाले एक बुज़ुर्ग का किरदार निभाया था, जिनके बच्चे पूरी तरह बड़े हो चुके थे। इस फिल्म के साथ उन्होंने खुद को बदलने का फैसला किया और शायद पहली बार उन्होंने अपने सुपरस्टार वाले नखरे छोड़ दिए।

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फिल्म के मशहूर भजन ‘चलो बुलावा आया है’ की शूटिंग के लिए राजेश खन्ना पैदल ही वैष्णो देवी मंदिर तक गए और बाकी यूनिट की तरह जमीन पर ही सोए। उनकी सह-कलाकार शबाना आजमी ने रेडियो नशा से बातचीत में बताया कि रास्ते में शौचालय नहीं थे और सिर्फ सार्वजनिक टॉयलेट ही उपलब्ध थे। ऐसे में काका, जो आमतौर पर निर्माताओं से खास खातिरदारी के आदी थे, हाथ में डिब्बा लेकर वॉशरूम की लाइन में खड़े रहते थे। “उस वक्त राजेश खन्ना यह नहीं कह सकते थे कि ‘मैं एक सुपरस्टार हूं’।”

फिल्म की सफलता किसी आशीर्वाद से कम नहीं थी और काका खुद भी लंबे समय बाद मिली इस कामयाबी से हैरान थे। ‘अवतार’ अमिताभ बच्चन की ‘कुली’ या ‘अंधा कानून’, सनी देओल की पहली फिल्म ‘बेताब’ या जैकी श्रॉफ की डेब्यू फिल्म ‘हीरो’ जितनी बड़ी हिट नहीं थी, लेकिन राजेश खन्ना के लिए यह ऐसा था जैसे उन्हें फिर से दरवाजे के अंदर एक पैर रखने का मौका मिल गया हो। मानो उन्होंने यह साबित कर दिया हो कि वह अब भी दोबारा सफल हो सकते हैं।

राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया की शादी कागजों में उनकी मौत तक बनी रही, लेकिन 1982 में फिल्म ‘सौतन’ की शूटिंग के दौरान दोनों अलग हो गए। इसी दौर में राजेश खन्ना की जिंदगी में टीना मुनीम आईं और उन्हें लगा कि वही उनकी जिंदगी की सारी परेशानियों का इलाज हैं।

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यासिर उस्मान की किताब Rajesh Khanna: The Untold Story of India’s First Superstar में राजेश खन्ना के हवाले से लिखा गया है,”मुझे पता है कि पिछले कुछ सालों में मेरे करियर के खराब दौर का कारण मेरी खराब एक्टिंग या मेरी बुरी आदतों को बताया गया। मुझे अक्सर खुद को बदलने की सलाह दी गई, लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। असल में जो बदला है, वह यह है कि पिछले एक साल से मैं अपनी निजी ज़िंदगी में खुश हूँ। इसलिए अब मैं चिड़चिड़ा नहीं रहता। इसका मेरी फिल्मों से कोई लेना-देना नहीं है।”

कुछ फिल्में हिट होने के बाद काका को लगा कि वह फिर से वापस आ गए हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें दोबारा सफलता मिली, वह अपनी पुरानी आदतों में लौट गए। यासिर उस्मान की किताब में सलीम खान ने कहा,”जब उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगीं, तो उन्होंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि गलती कहां हो रही है और क्यों। उन्होंने खुद के भीतर झांककर आत्ममंथन नहीं किया, बल्कि दूसरों को दोष देने लगे। उन्हें लगता था कि उनके खिलाफ कोई साज़िश रची जा रही है।”