सुरेंद्र सिंघल
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव और जाट बिरादरियों के मतदाताओं का बर्ताव 2022 के विधानसभा चुनावों के नतीजों को प्रभावित करेगा। 2019 के लोकसभा चुनावों में सपा-बसपा गठबंधन ने भाजपा को तगड़ी चुनौती दी थी। भाजपा सहारनपुर, बिजनौर,अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर और संभल की सीटें हार गई थीं।
विधानसभा चुनाव 2022 में जाटव और जाट दोनो अपनी धुरी से छिटके हुए नजर आ रहे हैं। मायावती के दलित वोट बैंक में जाटव मुख्य रूप से शामिल हैं। बसपा में मायावती के प्रबंधकों में शुमार रहे नसीमुद्दीन सिद्दिकी और मुनकाद अली जैसे मुसलिम नेताओं ने अपने हितों की पूर्ति के लिए दलितों में मतभेद पैदा किए और विभिन्न समूहों में प्रतिस्पर्धा भी पैदा की।
सहारनपुर में जो 22.23 फीसद दलित वोट बैंक है उसमें 90 फीसद हिस्सेदारी चर्मकारों की है। इनके चार नेता इलम सिंह, दिवंगत ईसम सिंह, जगपाल सिंह और रविंद्र मोल्हू मुख्य रहे हैं। ईसम सिंह का जैसे ही पार्टी में प्रभाव बढ़ा, उन्हें साजिश कर पार्टी से बाहर करा दिया गया। जगपाल और रविंद्र मोल्हू नजदीकी मुकाबले में पिछला चुनाव हार गए थे। तीन साल पूर्व रविंद्र मोल्हू भाजपा में शामिल हो गए थे जो हाल ही में भाजपा में अपनी परंपरागत रामपुर मनिहारान सुरक्षित सीट से टिकट मिलने का पक्का आश्वासन न मिलने पर बसपा में लौट गए। मायावती की हरौडा सीट से कई बार विधायक रहे जगपाल सिंह भाजपा में शामिल हो गए।
भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शानदार जीत दिलाने वाले जाट समुदाय में पार्टी को लेकर गहरी तल्खी और नाराजगी है। लेकिन आसन्न विधानसभा चुनाव में जाटों का मन डोल रहा है और वे पिछले चुनावों से अलग तरीके से अबकी मतदान कर सकते हैं। ओबीसी में शामिल गुज्जर बिरादरी में भी भाजपा का आकर्षण और लगाव कम हुआ है। रालोद और सपा के गठबंधन ने जाट और गुर्जरों की पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता को खत्म कर दिया है। इसका लाभ इस गठबंधन को मिल सकता है। जाहिर है पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को 2017 की सफलता दोहराने में पसीना बहाना पड़ेगा।
