उत्तराखंड में कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची क्या जारी हुई, पार्टी के भीतर हंगामा मच गया। अनेक सीटों पर टिकट के दावेदारों को निराशा हाथ लगी और उनके समर्थकों ने मुख्यमंत्री और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। यह मौजूदा चुनावी परिदृश्य का एक नमूना भर है। यों जब भी चुनाव आता है, टिकट बंटवारे को लेकर थोड़ी-बहुत नाराजगी का आलम रहता ही है, जो कि स्वाभाविक है, क्योंकि सबकी इच्छाएं और मांगें पूरी नहीं की जा सकतीं। मगर गौर करने की बात यह है कि बहुत सारी जगहों पर कार्यकर्ताओं के गुस्से का कारण दलबदलुओं को टिकट दे दिया जाना है। उत्तराखंड में कांग्रेस ही नहीं, भाजपा ने भी टिकट वितरण में दलबदलुओं को पुरस्कृत किया है; उसकी सूची जारी हुई तब भी ऐसी ही प्रतिक्रिया हुई थी। सबसे विचित्र तो यह रहा कि जो नारायण दत्त तिवारी जिंदगी भर कांग्रेस में रहे और कांग्रेस में रहते हुए उत्तर प्रदेश के भी मुख्यमंत्री रहे थे और उत्तराखंड के भी, वे इक्यानवे साल की उम्र में, बेटे को टिकट दिलाने की खातिर भाजपा में शामिल होने को राजी हो गए। इसकी घोषणा भी हो गई।
जिस भाजपा ने ज्यादा उम्र का हवाला देकर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा को ‘मार्गदर्शक’ बता कर किनारे कर रखा है उसे तिवारी का मान-मनौव्वल करने में तनिक संकोच नहीं हुआ। अलबत्ता अब जाने किस नफा-नुकसान का आकलन कर भाजपा ने उनसे मुंह मोड़ लिया है, और इस तरह तिवारी न इधर के हुए न उधर के। नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में रहते हुए कांग्रेस और कांग्रेस नेतृत्व का अपनी खास शैली में मजाक उड़ाते नहीं थकते थे। पर अमृतसर की अपनी लोकसभा सीट से अरुण जेटली को उम्मीदवार बनाए जाने के समय से ही भाजपा में असंतुष्ट रहे सिद्धू ने ऐन विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस का दामन थाम लिया, और अब वे अपने को जन्मजात कांग्रेसी बताते हुए कांग्रेस-नेतृत्व के गुण गा रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो दलबदल कराने में अपनी बहादुरी देखते हैं। उत्तराखंड और अरुणाचल में वे थोक में दलबदल करा चुके हैं। वोट बैंक की राजनीति को पानी पी-पीकर कोसने वाली भाजपा के पास जातिगत वोट जुटाने के लिए अपने लोग काफी नहीं थे, उसे बसपा से अलग हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को धूम-धड़ाके से अपने पाले में लाना जरूरी लगा। उत्तराखंड की तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने कई दलबदलुओं को टिकट देकर पुरस्कृत किया है। यह उस पार्टी का हाल है जो अनुशासन का दम भरती आई है।
मुलायम सिंह के खास रहे अंबिका चौधरी ने अब बसपा का दामन थाम लिया है। ज्यादा दिन नहीं हुए, जब जिंदगी भर कांग्रेस में रहीं रीता बहुगुणा को अचानक इलहाम हुआ कि नरेंद्र मोदी का नेतृत्व देश के लिए वरदान है और वे अपने भाई विजय बहुगुणा के पदचिह्नों पर चलते हुए भाजपा में शामिल हो गर्इं। कुछ दिनों से निवर्तमान और पूर्व विधायकों तथा अन्य टिकटार्थियों के इस पाले से उस पाले में जाने की खबरें रोजाना आती रही हैं। यह सब यही बताता है कि हमारी राजनीति विचारधारा, मूल्यों और अनुशासन तथा प्रतिबद्धता से विहीन हो चुकी है। दलों के बीच कोई ठोस फर्क है, तो नाम और निशान में। राजनीतिकों में लोकलाज भी नहीं रह गई है। जिस पार्टी में वे बरसों या दशकों तक काम कर चुके होते हैं, उससे वे एक झटके में किनारा कर लेते हैं, बस इसलिए कि उन्हें या उनके किसी परिजन, करीबी, चहेते को टिकट नहीं मिला। नीतियों, सिद्धांतों और कार्यप्रणाली को लेकर गहन मतभेद हों, तो अलग होना समझा जा सकता है। पर फौरी तथा क्षुद्र स्वार्थों के लिए पालाबदल हमारी राजनीति का एक सर्वाधिक चिंताजनक पहलू है।

